होम्योपैथिक चिकित्सा
होम्योपैथिक चिकित्सा
मंगलवार, 25 अप्रैल 2023
रविवार, 19 जून 2022
हिस्टीरिया रोग (होम्योपैथिक के चमत्कार भाग’2)
(होम्योपैथिक के चमत्कार भाग’2)
हिस्टीरिया रोग
हिस्टीरिया एक ऐसा मानसिक रोग है जो प्राय: महिलाओं में अधिक होता है, इस रोग के लक्षण इस प्रकार होते है, कि प्राय: व्यक्तियों को ऐसा लगता है कि रोगी पर किसी दुष्ट आत्मा, भूत प्रेत का साया है या फिर किसी ने जादू टोना कर दिया है । हिस्टीरियाग्रस्त रोगी रोगावस्था में कभी एकटक निहारती है, तो कभी नाचने गाने लगती है, कभी कभी तो विचित्र मुद्राओं में विभिन्न प्रकार की हरकतें करने लगती है, उसकी इस प्रकार की हरकतों से घर वालों को लगता है कि उसे कोई शारीरिक बीमारी नही है, बल्की इस पर किसी भूत प्रेत आदि का प्रभाव है, इसलिये कुछ व्यक्तियों में यह धारणा बन जाती है कि इस प्रकार के रोगी को किसी तांत्रिक को दिखला कर झाड फूंक कराना चाहिये, जबकि यह एक प्रकार का मानसिक रोग है ,अत: झाडफूक के चक्कर में न पड कर ऐसे रोग का उचित उपचार किया जाना चाहिये ।
हिस्टीरिया रोग ऐसी स्त्रीयों को अधिक होता है
जो परिवार में अधिक लाडली होती है । यदि ऐसी बच्चीयों की शादी ऐसे परिवार में हो
जाती है, जहॉ उसे पूरा प्यार नही मिलता
या फिर ऐसी लडकीयॉ जो शादी से पूर्व किसी दूसरे से प्यार करने लगती है , एंव उनकी शादी उनके मन पसंद लडके से नही होती , इसी
प्रकार की और भी कई समस्यायें है, जो उसके मस्तिष्क में घर कर जाती है । इससे उसके मस्तिष्क में तनाव
होने लगता है हार्मोस स्त्राव तथा सिम्फाईटम पैरासिम्फाईटिक तथा वेगस नर्व की
असमानता के परिणाम स्वरूप उसका प्रभाव पाचन तंत्र प्रणाली पर देखा जाता है ।
इसमें उसकी संसूचना प्रणाली के साथ नर्वस तंत्र अनियंत्रित हो जाते है , इसका ही
परिणाम है कि वह कभी गाना गाने लगती है, तो कभी क्रोध से वस्तुओं को फेकने लगती
है, कभी कभी तो विभिन्न मुद्राओं में अश्लील हरकते भी करने लगती है ।
चीन व जापान की एक प्राकृतिक उपचार विधि ची नी
शॉग है , इसके उपचारकर्ताओं का मानना है कि इस रोग का मूल कारण तो रोगी के मस्तिष्क
की सोच होती है , परन्तु इसका प्रभाव उसके संसूचना तंत्र एंव नर्वस तंत्र पर होता
है । संसूचना एंव नर्वस तंत्र के संयुक्त प्रभावों का परिणाम रोगी के पेट पर महसूश होता है, इसलिये प्राय:
इसके रोगी को पेट से एक गोला गले तक उठता हुआ प्रतीत होता है, इसके बाद ही उसे
हिस्टीरिया के दौरे पडने लगते है । नाभी चिकित्सकों का मानना है कि हिस्टीरिया
का कारण रोगी अपने असन्तुलित विचारों को नियंत्रित नही कर पाता, इसी के कारण उसका मानसिक तनाव इतना बढ जाता
है कि उसे पेट से गोले उठने या पेट में सिहरन की अनुभूतयॉ या कभी कभी र्दद उठता है,
इस रोग का उदगम स्थल नाभी है एंव नाभी स्पंदन का अपनी जगह से हट जाना है ,जिसकी
वहज से रस एंव रसायनों में असमानता होती है और यही इस रोग का प्रमुख कारण है ।
नाभी
स्पंदन से रोग निदान चिकित्सकों का मानना है कि नाभी का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क
व भावनाओं से होता है । उक्त दोनों
चिकित्सा पद्धतियों में बिना किसी दवा दारू के कई प्रकार के मानसिक रोगों को ठीक कर दिया जाता है । ची नी
शॉग चिकित्सा में पेट पर पाये जाने वाले आंतरिक अंगों को टारगेट कर उसे सक्रिय कर
उपचार किया जाता है एंव नाभी चिकित्सा में नाभी स्पंदन का परिक्षण कर उसे यथास्थान
लाकर उपचार किया जाता है, इन दोनो
प्राकृतिक उपचार विधि में करीब करीब काफी समानतायें है, दोनो उपचार विधियों का
मानना है कि नाभी स्पंदन का अपने स्थान से हट जाने पर संसूचना प्रणाली एंव
मस्तिष्क पर प्रभाव पर प्रभाव पडता है, इससे रस एंव रसायनो का संतुलन बिगड जाता है । इसे आधुनिक चिकित्सा
विज्ञान में हार्मोन्स की असमानता भी कहते है ।
होम्योपैथिक
चिकित्सा एक लक्षण विधान चिकित्सा पद्धति है इसमें रोग के लक्षणों को औषधियों के
लक्षणों से मिलाकर औषधियों का निर्वाचन कर उपचार किया जाता है । हिस्टीरियाग्रस्त
रोगीयों का होम्योपैथिक औषधियों के लक्षणानुसार विवरण निम्नानुसार है ।
1-किसी
अप्रिय घटना या दु:ख को मन में दवा लेने से (इग्नेशिया):-किसी अप्रिय घटना जैसे किसी
प्रियजन या घर के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाना ,या प्रेमी का उसे छोड देना ,किसी शोक या दु:ख से उत्पन्न मानसिक रोग,
रोगी अपने दु:ख को अपने मन के अन्दर दवाये रहता है किसी से शेयर नही करती आदि
स्थिति के कारण हिस्टीरिया हो तो यह दवा उपयोगी है इसका रोगी एकान्त में बैठा
अपने दु:ख को सहा करता है वह अपना दुख दूसरों को नही बतलाता, इसके रोगी का स्वाभाव बदलते रहता है, एक क्षण रोना तो दुसरे ही क्षण हॅसने लगता
है यह हिस्टीरिया रोग की महौषधी है परन्तु डॉ0 डनहम का कथन है कि कोई भी औषधिय
हिस्टीरिया रोग के लक्षणों से इतनी नही मिलती जितनी यह मिलती है, परन्तु डॉ0
कैन्ट का कहना है कि यह हर प्रकार के हिस्टीरिया रोग को दूर नही करती, परन्तु यह ऐसे रोगियों को ठीक कर देती है
जो अत्यन्त बुद्धिमान हो ,कोमल तथा
मृदुस्वाभाव के नाजुक तथा अत्यन्त भावुक प्रवृति के हो किन्ही कारणों से अत्यन्त
उत्तेजित हो जाने पर उनका ऐसा व्यवहार हो जिसे वे स्ंवय न समक्ष सके । हिस्टीरिया
में उक्त लक्षणों के साथ सिर में तेज र्दद या मूर्छा हुआ करती है इसके साथ पेट से
एक गोला आकर गले में अटकता है ।यह सर्द प्रकृति की दवा है । इस दवा के विषय में
हैनिमैन सहाब का कहना है कि इस दवा को सोने से पहले देने से रोगी को बैचेने हो
सकती है । 30 ,200 पोटेंसी में दवा का प्रयोग
किया जा सकता है ।
2-पेट में अफारे के परिणाम से गोलें का उठता
श्वास लेने में कष्ट है (एसाफेटिडा):- यह दवा हींग से बनाई जाती है,पेट में
वायु संचय होने पर आयुर्वेदिक में हींग से बनी दवाओं का प्रयोग होता है, हिस्टीरिया में पेट से एक गोला उठता है जो
ऊपर की तरफ गले में आ कर रूकता है ,यह पेट में गैस बनने की बजह से जब गैस नीचे के रास्ते से न निकल कर ऊपर
गले की तरफ बढती है इसका परिणाम यह होता है कि रोगी को बार बार डकारे आती है । पेट
में गैस बनने एंव उसकी गति उर्ध्वगामी याने ऊपर की तरफ हो तो यह दवा हिस्टीरिया
रोग में प्रयोग की जा सकती है ।
3-आनन्द
नाचना गाना कभी क्रोधित दुखी पेट में गोला उठना (क्रोकस सैटाईवा) -यह दवा केशर से बनाई जाती है, हिस्टीरिया रोग में बहुत अधिक आनन्द होना, नाचना और गाना, कभी क्रोध तो कभी दु:खी होना आदि में इस
दवा का प्रयोग किया जाता है ,रोगी को पेट में कोई गोलाकार जिन्दा वस्तु धुमने
फिरने का अहसास होता है यह क्रोकस सैटाईवा का खॉस लक्षण है
इस दवा
को बार बार दोहराने की जरूरत पडती है अत: आवश्यकतानुसार इसकी निम्न शक्ति का
प्रयोग उचित है आवश्यकता पडने पर इसकी उच्च शक्ति का प्रयोग भी किया जा सकता है
परन्तु प्रारम्भ में निम्म शक्ति की दवाओं से ही उपचार करना उचित है ।
4-स्नायु
शूल न्यूरैल्जिया (साइप्रिपिडियम प्यूबिसेन्स) - हिस्टीरिया ग्रस्त महिलाओं में नर्तन
रोग, (कोरिया) स्नायु शूल (न्यूरैल्जिया)तथा
स्नायु सम्बन्धित रोगों में साइप्रिपिडियम प्यूबिसेन्स दवा निर्देशि है ।
मानसिक खराबी आदि लक्षण रहने पर यह दवा उपयोगी है । कभी कभी कुछ चिकित्सक हिस्टीरिया
रोग में अन्य सुनिर्वाचित औषधियों के साथ मानसिक गडबडी के लक्षणों के उपचार के
लिये इसका प्रयोग करते है दवा को आवश्यकतानुसार निम्न या उच्च शक्ति में प्रयोग
किया जा सकता है ।
5-हिस्टीरिया
में पेट से गोले का उठना जो गले में आकर अटकता हो (कोनियम मेक):-पेट से एक गोला उठता है जो गले
में आकर अटकता है, जिसे रोगी
बार बार निगलने का प्रयास करती है जिसे ग्लोबस हिस्टेरिकस कहते है ,परन्तु वह गोला नीचे खिसक कर पुन: गले में आ जाता है ,इस औषधिय में ग्रन्थियों का कडा होना है जो
स्तन गाठ , कैंसर टयूमर आदि में हो सकती
है प्रोस्टेट में भी यह स्थिति निमिर्त होती है डॉ सत्यवृत जी ने लिखा है कि जब
स्त्रीयों को अपने शरीर की ग्रांथियों का कडापन देखकर मासूसी, नउम्मीद, होने लगे तब इस प्रकार का गोला पेट से उठा करता है
। इसमें जबरजस्त संयम के बुरे मानसिक परिणाम के लक्षण भी देखे जाते है ,इस औषधिय का विलक्षण लक्षण यह है कि रोगी के
ऑख बन्द करते ही पसीना आने लगना तथा ऑखे खुलते ही पसीने का बन्द हो जाना यह दवा
सर्द प्रकृति की है ।
दवा 6 ,30,200 पोटेंसी में प्रयोग करने के
निर्देश है ।
6-तेज
सिर र्दद या मूर्छा के साथ पेट से गोला उठे रोग एक जगह टिक न सके (बेलेरियम)-: सख्त सिर र्दद, सामान्य कारण से मूर्च्छा होने के साथ
पेट से गर्म भांप की तरह गोला उठे, रोगी का पूरा स्नायु संस्थान उत्तेजित तथा चिन्ताग्रस्त होता है रोगी को स्नायुविक
बैचेनी घेर लेती है । यह दवा स्नायु संस्थान की ऐसी बैचेनी, उत्तेजना तथा चिन्ता को ठीक कर देती है
इससे रक्त संचार की उत्तेजना भी कम हो जाती है एंव उसे शान्ति का अनुभव के साथ
नींद आने लगती है । इस औषधिय का प्रधान लक्षण बैचैनी है इसी बैचेनी का परिणाम यह
होता है कि रोगी एक जगह पर टिक कर नही बैठ सकता वह जगह बदलते रहता है यहॉ वहॉ चलता
फिरता है बातों में भी वह किसी एक विषय पर केन्द्रित नही होता इसका परिणाम यह
होता है कि वह एक विषय से हट कर दूसरे विषय पर छलॉग लगाता है दिमाक तेज विचारों से
भरा रहता है । परन्तु मन में काल्पनिक वस्तुऐ दिखालाई देने लगती है स्वयम को
वह समक्षती है कि जो वह है वह नही है वह कोई और ही है । इस दवा का विलक्षण लक्षण
यह है कि वह जब तक बैठी या लेटी रहती है तब तक उसके मन में ऐसे विचार आया करते है
ज्योही वह उठकर चलने फिरने लगती है उसके ये विचार गायब हो जाते है । रोगी अपने को
हल्का महसूस करती है , रोगी को सिर
पर वर्फ की तरह ठंडा महसूस होता है,इस प्रकार के हिस्टीरिग्रस्त लक्षणों में
इस दवा का मूल अर्क (मदर टिंचर) या 6 , 30 शक्ति की दवा को दिन में तीन बार देना चाहिये ।
7-बैंचेनी, घबराहट सम्पूर्ण अंग में रोगी
अपने को तथा दूसरों को चोट पहुंचाता है शरीर की मांसपेशीयों में कम्पन्न -(टेरेन्टुला
हिस्पैनिका)-यह
मकडी के विष से बनाई जाने वाली दवा है । इस दवा में सम्पूर्ण शरीर में बैचेनी
रहती है तथा मॉसपेशीयों में कम्पन्न के लक्षण पाये जाते है , इस दवा का एक प्रमुख लक्षण है वह यह कि
संगीत से रोगी के लक्षणों में कमी आती है , परन्तु कभी कभी संगीत से वह उत्तेजित होकर नाचने गॉने लगती , रोगी को कभी भी दौरे पड जाते है एंव वह स्वयम
को या दूसरों को चोट पहुचाने का प्रयास करती है,रोगी की मॉसपेशीयों में कम्पन्न् होता है इससे
वह फडकती है हाथ पैर हिलते रहते है झटके लगते है ऐठन पडती है इस उग्र दशा में रोगी
बिना होश के अजीब तरह की हरकत करता है हाथ पैरों को नाचने की सी अवस्था में बनाता
रहता है । इस औषधिय का एक विशेष लक्षण ध्यान रखने योग्य है वह है जब रोगी की तरफ
ध्यान दिया जाता है तब ही उसे हिस्टीया के दौरे या आक्रमण होता है , रोग का एक निश्चित समय पर होना ,रोगी हर बात में जल्दी जल्दी करता है जो
काम हो उसे भी जल्दी जल्दी पूरा करना चाहता है जल्दबाजी के लक्षणों को भी ध्यान
में रखना चाहिये इस औषधि की रोगणी को बहुत दिनों तक स्थाई फिट आते है जल्दी जल्दी
फिट आते है (एपिलेप्टि फार्म) अत: यह दवा एपिलेप्टि फार्म हिस्टीरिया की विशेष
दवा है । दवा सर्द प्रकृति के रोगीयों के अनुकूल है ।
यहॉ पर
मै थोडा सा होम्योपैथिक प्रुविंग से हट कर इस दवा को याद रखने के लिये एक सामान्य
सा उदाहरण पेश कर रहा हूं आप सब ने मकडी को देखा ही होगा वह शांत नही बैठती उसके
हाथ पैरों में हमेशा फडकन व कम्पन्न होता रहता है किसी भी कार्य को वह तीब्रता
से करती है तथा हमेशा बैचैनी जैसी स्थिति में दिखलाई देती है ,
उसकी तरफ देखा जाये तो उसके शरीर की समस्थ हरकते बढ जाती है वह कॉपने
धरधराने लगती है उसके हॉथ पैरों में कम्पन्न होने लगता है वह नाचने वा भागने का
प्रयास करती नजर आती है , हर कार्य में
उसे शीध्रता रहती है । हिस्टीरिया ग्रस्त
रोगीयों को यह दवा 6, 30, 200 पोंटेंसी में देना चाहिये ।
डॉ0कृष्णभूषण सिंह चन्देल
जन जागरण चैरिटेबिल होम्योपैथिक क्लीनिक
हीरोशोरूम के बाजू से संगम टेन्ब् हाउस के पास
बण्डा रोड मकरोनिया सागर म0प्र0
मो0 - 9926436304
रविवार, 12 जून 2022
अध्याय-21 कब्ज ( होम्योपैथी के चमत्कार भाग -2 )
( होम्योपैथी के चमत्कार भाग -2 )
अध्याय-21
कब्ज
|
क्र |
रोग |
औषधि |
|
1 |
कब्ज रहने पर |
नक्स वोमिका तथा सल्पर |
|
2 |
पुरानी कब्जियत |
हाईड्रैस्टिस केन |
|
3 |
सक्त कब्ज ,बहुत पुरानी कब्ज |
लैक डिफ्लोरेटम |
|
4 |
लैट्रिग जाने की इक्च्छा का न होना |
एलूमिना |
|
5 |
बार बार प्यास लगना एंव मल सूखने पर |
ब्रायोनिया |
|
6 |
लैट्रिग जाने की इक्च्छा का न होना, उघाई रहना |
ओपियम |
|
7 |
लैट्रिग जाने की इक्च्छा का न होना, स्नायविक शिथिलता |
प्लम्बम मेटैलिकम |
अध्याय-21
कब्ज
आज की इस भाग दौड भरी जिन्दगी में उल्टा सीधा खाने व महनत न करने के कारण कई
प्रकार की बीमारीयॉ हो रही है उनमें से एक है कब्ज जिसमें स्वाभाविक तौर से व्यक्ति
समय पर खुल कर शौच नही जा पाता ।
1-कब्ज
रहने पर (नक्स वोमिका तथा सल्पर ) :- प्राय: कब्ज होने पर
होम्योपैथिक में नक्स सुबह तथा सल्फर सोने से पहले दिये जाने के निर्देश है इस
दवा को 30 पोटेंशी में लेना चाहिय तथा नक्स वोमिका को सुबह लेना चाहिये ।
2- पुरानी कब्जियत (हाईड्रैस्टिस केन) :-
डॉ0 सत्यवृत जी ने लिखा है कि इग्लैड के डॉ0 हुजेज का अनुभव है कि कब्ज में
हाईडैस्टिस , नक्स से भी अच्छा काम करती
है । उनका कथन है कि इस दवा के मूल अर्क की एक बूंद कई दिनों तक लेते रहने से कब्ज
में लाभ होता है ,इस दवा के पहले वह नक्स वोमिका
दिया करते थे ,परन्तु अगर रोगी को सिर्फ
कब्ज की ही शिकायत हो तो यह उसके कब्ज की सर्वौत्तम दवा है । इस दवा के लक्षणों
में रोगी को ऐसा अनुभव होता है कि उसका पेट अन्दर की तरफ धंस रहा है । इस सर्न्दभ
में डॉ0 नैश का कहना है कि पुरानी कब्जियत में यह दवा श्रेष्ट है । डॉ0 हैल का
कहना है कि कब्ज में इस दवा को मूल अर्क या निम्न शक्ति में देना चाहिये । परन्तु
डॉ0 सरदार मल जैन होम्योसेवक व मैटेरिया मेडिका के लेखक है उनका अनुभव है कि उन्होने हाईड्रैस्टिस केन
200 शक्ति की दिन में दो बार देने से उन्हे बरसो पुरानी कब्ज की रोगणी को ठीक
किया था जो कब्ज की दवा खाते खाते थक चुकी थी । इस दवा की उच्च शक्ति से उसके
कब्ज में पूर्ण अराम हुआ । अत: रोग स्थिति के अनुसार इस दवा का प्रयोग किया जा
सकता है ।
3-सक्त कब्ज ,बहुत पुरानी कब्ज (लैक डिफ्लोरेटम):- बहुत
पुरानी एंव सख्त कब्ज इससे ठीक हो जाती है लैट्रिंग सख्त आती है इस दवा के
प्रयोग से लाभ होता है । इस दवा का प्रयोग 6 ,30 एंव 200 पोटेंसी में करना चाहिये ।
4-लैट्रिग जाने की इक्च्छा का न होना (एलूमिना):-
इसके रोगी को लैट्रींग जाने की इक्च्छा नही होती कई कई दिनों तक वह शौच नही जाता
जब तक लैट्रिंग इकठ्ठी नही हो जाती , उसे मल त्यागने के लिये काफी जोर लगाना पडता है ।
5-बार बार प्यास लगना एंव मल सूखने पर (ब्रायोनिया)- सूखेपन के कारण रोगी को बार बार प्यास का लगना , मल सूखा रोगी गर्म प्रकृति का हो इन अवस्था में ब्रायोनिया दवा का प्रयोग
किया जा सकता है इस दवा को ३० या २०० पोटेंसी में प्रयोग करना चाहिये ।
6-लैट्रिग जाने की इक्च्छा का न होना, उघाई रहना (ओपियम):-ब्रायोनिया
की तरह इसमें भी सूखापन पाया जाता है परन्तु इसके रोगी के समस्त अंगों में
पक्षाधात की सी शिथिलता पाई जाती है, आंत व पाचन संस्थान की गति शिथिल होती है । इसके रोगी में भय से उत्पन्न
दृष्य सामने बने रहते है,इसके
रोगी को उघाई रहती है । इस प्रकार की स्थिति में ओपियम दवा का प्रयोग किया जा सकता
है । यह दवा अफीम से बनाई जाने वाली दवा है इसका प्रभाव इस दवा को 30 या 200 शक्ति में प्रयोग करना
चाहिये ।
7-लैट्रिग जाने की इक्च्छा का न होना, स्नायविक शिथिलता (प्लम्बम
मेटैलिकम):- यह दवा सीसा से बनती है अत: जो लोग सीसा के सम्पर्क
में रहते है या पेंटिग आदि का काम करते है ,कब्ज के रोगी में आंतों में शिथिलता पाई जाती है जो ओपियम में भी पाई जाती है
परन्तु इसमें स्नायविक शिथिलता देखी जाती है यह शिथिलता का प्रभाव मन पर भी पडता
है रोगी को कुछ भी याद नही रहता ,इस
शिथिलता का प्रभाव आंतों पर भी होता है आंते शिथिल हो जाती है मल को बाहर धकेलने
की उसमें शक्ति नही होती आंतों में मल सूख जाता है ,सख्त कब्ज की यह उत्तम दवा है । इस दवा की 30 या 200 का प्रयोग आवश्यकतानुसार
किया जा सकता है ।
D/homeo book 2019-20/होम्योपैथिक बुक कम्प्लीट
अध्याय-20 दॉतो के रोग ( होम्योपैथी के चमत्कार भाग -2 )
( होम्योपैथी के चमत्कार भाग -2 )
अध्याय-20
दॉतो
के रोग
|
क्र |
रोग |
औषधि |
|
1 |
दॉत निकलते ही सडने लगते,दॉतो में र्दद
|
क्रियोजोटम) |
|
2 |
दॉत र्दद |
प्लैन्टिगो 30 |
|
3 |
दांतों का काले पडने ,उस पर काली रेखाये दिखने एंव दांत टुकड टुकड होकर
टूटेने पर |
स्टैफिसैग्रिया |
|
4 |
दांत जडों से सडने लगते है तथा बाकी भाग ठीक रहता है |
थूजा |
|
5 |
पायरिया |
हेक्ला लावा |
|
6 |
पायरिया में मुंह से बुरी गंध आने पर |
पाइरोजेन |
|
7 |
दॉतो पर मैल जमना |
एसिड म्यूर |
|
|
|
|
अध्याय-20
दॉतो के रोग
1-दॉत निकलते ही सडने लगते,दॉतो में र्दद
(क्रियोजोटम) :- कियोजोटम में दॉत निकलते ही
सडने लगते है । डॉ0 सत्यवृत जी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि इसे दांत और
मसूडों की सर्वोत्तम दवा कहा जाना चाहिये । बच्चों के दॉत निकलते क्षय होने लगते
है दांत नील पीले काले रंग के हो जाते है दांतो से खून रिसता हो तो यह दवा 30
शक्ति में दिन मे तीन बार देना उचित है । दॉतों के दर्द में क्रियेजोटम क्यू को
रूई में भिगोकर दॉत र्दद वाले स्थान पर लगा दे एंव लार को गिरने दे इससे तुरन्त
दॉत का र्दद ठीक हो जायेगा ।
2- दॉत र्दद (प्लैन्टिगो 30):- दॉत के र्दद में प्लैन्टिगो
क्यू को दॉतों में जिधर दर्द हो उस स्थान पर लगाये व इसकी 30वी शक्ति खिलाये
इससे दर्द में लाभ होगा ।
3-दांतों का काले पडने ,उस पर काली रेखाये दिखने एंव दांत टुकड टुकड होकर
टूटेने पर (स्टैफिसैग्रिया) :- दांतो के काले पडने उसपर
काली रेखाये ऊभरने पर एंव दांत टुकडे टुकडे हो कर टूटने लगे तब ऐसी स्थिति में स्टैफिसैग्रिया
30 या 200 शक्ति में दी जा सकती है ।
दांतों
की जडे खुरने लगे तो मेजेरियम इसमें दांतो का क्षय एकदम से शुरू होता है दांतों का
इनैमल पहले खुरदरा हो जाता फिर झडने लगता है ।
4-दांत जडों से सडने लगते है तथा बाकी
भाग ठीक रहता है (थूजा):- इस दवा में भी दांत जड से सडने लगते है तथा बाकी भाग ठीक
दिखलाई देता है । ऐसी परस्थितियों में थूजा 200 या और भी उच्च शक्ति में प्रयोग
करने से परिणाम अच्छे मिलते है । यदि रोगी में साईकोसिस के लक्षण दिखलाई दे तो यह
दवा उपरोक्त कष्टों को तो दूर करेगी ही उसकी अन्य बीमारीयॉ भी अपने आप ठीक हो
जायेगी ।
5-पायरिया (हेक्ला लावा) :-पायरिया में हेक्ला लावा
दवा को 6-एक्स में या 30 पोटेंसी में प्रयोग किया जा सकता है ।
6-पायरिया में मुंह से बुरी गंध आने पर (पाइरोजेन)
:- पायरिया में यदि मुंह से बुरी र्दुगंध आये तो पाइरोजेन दवा की 30 पोटेंसी दिन
में तीन बार देना चाहिये इससे पायरिया में जो बुरी गंध आती है उसमें लाभ होता है परन्तु
इसके साथ अन्य पायरिया की निर्वाचित दवाओं का प्रयोग किया जाना चाहिये ।
7-दॉतो पर मैल जमना (एसिड म्यूर) –कई व्यक्तियों के दॉतों पर चाहे वे कितना भी ब्रश करे
उनके दॉतो पर मैल जमती है ऐसे रोगीयो को
एसिड म्यूर 30 या 200 पोटेशी में देना चाहिये
होम्योपैथिक
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( होम्योपैथी के चमत्कार भाग -2 ) अध्याय-20 दॉतो के रोग क्र रोग ...


