शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020
गुरुवार, 10 दिसंबर 2020
पथरी का होम्योपैथिक उपचार डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल
पथरी
पथरी रोग में होम्योपैथिक
दवा काफी कारगर साबित हो रही है , इसका एक कारण यह भी है कि इस चिकित्सा पद्धति
में होम्योपैथिक किसी रोग का उपचार न कर लक्षणों का उपचार करता है इससे कई
प्रकार के ऐसे रोग जो अधुनिक चिकित्सकों की समक्ष में भी नही आता उसका उपचार एक
कुशल होम्योपैथ चिकित्सक आसानी से कर लेता है यहॉ पर हमने कुछ दवाओं के रोग
लक्षणानुसार वर्णन किया है जिसका लाभ पाठक उठा सकते है परन्तु दवाओं के प्रयोग से
पहले किसी होम्योपैथिक चिकित्सक की सलाह अवश्य लेले ताकि दवा प्रयोग में सुविधा
हो ।
पथरी रोग की
प्रतिषेधक दबा (कैल्केरिया कार्ब) :- कैल्केरिया कार्ब पथरी रोग की प्रतिषेधक
दबा है दो या तीन सप्ताह के अन्तर से 200 या उच्च शक्ति में सी एम आदि की एक
मात्रा देना चाहिये इसके र्दद के समय रोगी को बहुत अधिक पसीना आता है । डॉ0सैण्डस
मिल्स तथा हूाजेस लिखते है कि पित्त पथरी का कष्ट दूर करने के लिये कैल्केरिया
कार्ब अत्युत्म दबा है उनका कहना है कि इस दवा को पन्द्रह पन्द्रह मिनट के अन्तर
देकर देना चाहिये इससे तीन घंटे में दर्द दूर हो जायेगा ।
पथरी तथा गठिये में
(आर्टिका यूरेंस क्यू) :- डॉ0 बर्नेट का कहना है कि पथरी और गठिये में कुछ दिनों तक
आर्टिका क्यू में उपयोग करने से ठीक हो जाता है ।
मूत्र में पथरी
(हाइड्रेजिंया क्यू) :- मूत्र पथरी के लिये हाईड्रजिंयॉ क्यू काफी महत्वपूर्ण दवा
है । यह दवा फिर से होने बाले मूत्र पथरी को रोकने में सहायक है ।
पथरी सारसापैरिला
(अनुभव केस डॉ0 केन्ट) :- मूत्राश्य की पथरी के लिये सारसापैरिला एक अच्छी दवा है
सार्सापैरिला के रोगी के पेशाब का तलछट सफेद होता है तथा लाईकोपोडियम का लाल । इस
सम्बन्ध में डॉ0 केन्ट का एक अनुभव विशेष महत्व रखता है उन्होने लिखा है कि
एक वृद्ध व्यक्ति को मूत्राश्य में पथरी हो गयी थी शाल्य चिकित्सकों ने अपरेशन
की तैयारी कर ली थी परन्तु उसने डॉ0केन्ट को बुलाया डॉ0 केन्ट ने उसके लक्षणों
का अध्ययन कर उसे सारसापैरिला दिया रात भर कष्ट के पश्चात उसकी पथरी निकल गयी ।
कुछ चिकित्सकों की सलाह है कि सारसापैरिला 200 शक्ति में भी देकर देखना चाहिये ।
डॉ0 हेरिंग इस औषधि के बडे पक्षधर थे । पथरी तथा गुर्दे के दर्द की यह उत्तम दवा
है रोगी की तकलीफे गर्म खाने पीने से बढती है किन्तु गर्म सेक से उसे आराम मिलता
है यह इसका विशेष लक्षण है ।
मूत्र पथरी
(कैंथरीस) :- मूत्र पथरी के लिये कैन्थरीस एक बहूमूल्य दबा है खॉस कर
जब कि मूत्र नली में बहुत जोर का र्दद हो डॉ0घोष ने कहॉ है कि यह दबा मूत्र के वेग
को बढा कर पथरी को बाहर निकाल देती है । इसी प्रकार मूत्र को बढा कर पथरी को
निकालने में बरबेरिस तथा लाईकोपोडियम की भी एक अहम भूमिका है ।
गुर्दे में पाई जाने
वाली पथरी (पोलीगोनम):- गर्दे में पाई जाने वाली पथरी के लिये
पोलीगोनम एक अत्यन्त उत्तम दबा है ।
यूरेट आफ सोडा का
गुर्दे में बैठने से गुर्दे की पथरी (साईलेसिया) :- डॉ सत्यवृत जी ने
लिखा है कि कभी कभी यूरेट आफ सोडा गुर्दे में बैठ जाता है जिससे गुर्दे में पथरी
बन जाती है डॉ0सुशलर का कहना है कि इस अवस्था में साईलेसिया यूरेट से मिलकर उसे
धोल देती है एंव उसे शरीर से निकाल देती है इस लिये गुर्दे की पथरी व जोडों के
दर्द में साईलैसिया लाभप्रद है ।
पथरी के बनने की
प्रवृति को रोकने के लिये (चाईना) :- पथरी के बार बार बनने की प्रवृति को रोकने के लिये चाईना 6
में कुछ दिनों तक दिया जाना चाहिये । डॉ0 फैरिंगटन ने लिखा है कि बोस्टन के डॉ0
थेयर का कथन है कि पित्त पथरी की प्रवृति को रोकने के लिये चाईना 6 एक्स का कई
महिनों तक प्रयोग करना चाहिये पहले 10 दि तक रोज फिर दो तीन दिन का अन्तर देकर दस
दिनों तक दे इस प्रकार इसका प्रयोग कुछ लम्बे समय तक करते रहने पर पथरी बनने की
प्रवृति ठीक हो जाती है ।
गॉल स्टोन या पित
पथरी (कोलेस्टरीन 2,3 विचूर्ण) :- यह गॉल स्टोन से बना नोसोड दवा है डॉ0 बर्नेट और डॉ0 स्वान
ने पित्त पथरी में इसे बहुत उपयोगी पाया है । डॉ0 यिंगलिग लिखते है कि पित्त
पथरी के र्दद में रोगी के लक्षणों का मिल पाना बहुत कठिन होता है उन्होने इस र्दद
में कोलेस्टरीन 3 एक्स शक्ति के विचूर्ण को बहुत उपयोगी पाया है ।
पित्त पथरी एंव
मूत्र पथरी :- कैल्केरिया कार्ब तथा बरबेरिस ये दोनों दवाये पित्त पथरी
एंव मूत्र पथरी दोनों में लाभप्रद है
ओसियम कैनम (तुलसी
के पत्ते का रस ) :- रोगी
में यूरिक ऐसिड की प्रवृति पेशाब में लाल तल छट गुर्दे में र्दद खॉसतौर पर दाहिने
तरफ ऐसी स्थिति में इस दवा का प्रयोग 6, 30 या 200 शाक्ति में इसका प्रयोग करना
चाहिये ।
मूत्र पथरी (यूरिन
स्टोन)
पेशाब में सफेद तल
छट (हाइड्रैन्जिया) :- पेशाब में सफेद तल छट या खून के गुर्दे का र्दद खॉस कर बाई
पीठ में र्दद मूत्र नली पर इसका विशेष प्रभाव है । इस दवा के पॉच से दस बूंद टिंचर
दिन में तीन चार बार देना चाहिये ।
पेशाब बहुत कम (सैलिडैगो) :- पेशाब बहुत कम आता
है गुर्दे का र्दद रिनल कॉलिक पेट तथा मूत्राश्य तक जाता है इसके प्रयोग से कभी
कभी कैथीटर के इस्तेमाल की भी जरूरत नही पडती टिंचर या 3 शक्ति में दवा का प्रयोग
करे ।
मूत्र में लाल कण के
तल छट बैठना (लाईकोपोडियम) :- इस दवा के रोगी के मूत्र में लाल कण के तल छट बैठ जाते
है लाइकोपोडियम में लाल रंग का तलछट होता है । पेशाब करने से पहले कमर में र्दद
होता है पेशाब कर चुकने के बाद र्दद बन्द हो जाता है । लाइकोपोडियम 200 शक्ति में
देने से मूत्र पथरी बनने की प्रवृति रूक जाती है ।
लाइको0 से लाभ न हो
और यूरिक ऐसिड बनने की प्रवृति (आर्टिका यूरेन्स :- अगर लाइकोपोडियम से
लाभ न हो और रोगी मे यूरिक ऐसिड बनने की प्रवृति हो तो इससे लाभ होता है इस दबा को
टिंचर में या 6 शक्ति में प्रयोग करना चाहिये ।
हर प्रकार की पथरी
बिना अपरेशन के निकालने हेतु (कोलियस एरोमा) :- हर प्रकार की पथरी को यह दवा निकाल देती है
यह दवा पथरी में बूंद बूंद पेशाब मूत्र में रेत की तरह कण आना मूत्र में रक्त आना
दाहिनी ओर गुर्दे की सूजन में इस दवा का प्रयोग किया जाना चाहिये यह दबा पथरी को
गलाकर मूत्र मार्ग से निकाल देती है इस दवा को मूल अर्क में प्रयोग करना चाहिये ।
डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल (बी0एच0एम0एस,एम0डी0) अध्यक्ष -जन जागरण धमार्थ चिकित्सालय बजाज शो रूम के सामने नर्मदा बाई स्कूल बण्डा रोड मकरोनिया सागर मध्यप्रदेश मो0 9630309033
नेवल एक्युपंचर बनाम नेवल होम्योपंचर
नेवल एक्युपंचर
बनाम नेवल होम्योपंचर
मात्रा में मसल्स होते है फिर इन क्षेत्र
में शरीर के आंतरिक(खतराक) हिस्से मसल्स के काफी नीचे होते है । अत: इन भाग पर
पंचरिंग करने से किसी भी प्रकार का खतरा नही होता । इसका कारण यह है कि पेट पर
लगभग एक इंच से लेकर दो या आधिक चरर्बी है तो और भी नीचे आंतरिक अंग होते है ।
अत:इस भाग पर पंचरिग करने से किसी भी
प्रकार का खतरा नही होता । नेवल एक्युपंचर में सूईयो को आधे इंच से या इससे भी कम
मसल्स के अन्दर डाली जाती है मल्सल्स के अन्दर कितनी सूई को धुसाना है इसके
लिये रोगी के पेट की मसल्स का पहले परिक्षण कर यह मालूम कर लिया जाता है कि पेट
पर कितनी मोटी मसल्स की परत है । फिर उसके हिसाब से सूई
को इस प्रकार से चुभाते है ताकि मसल्स के
आधे भाग तक ही सूई जाये ताकि पेट के
आंतरिक अंगों पर सूई का प्रभाव न हो ।
नेवल एक्युपंचर चिकित्सको का मानना है कि
शरीर के सम्पूर्ण आंतरिक एंव वाहय अंगों के चैनल इस पांईन्ट से हो कर गुजरते है
, जैसा कि हमारे प्राचीनतम आयुर्वेद मे कहॉ गया है कि नाभी से हमारे शरीर की 72000
नाडीयॉ निकलती है । नेवल एक्युपंचर चिकित्सा सरल होने के साथ पंचरिग भी
सुरक्षित है एंव उपचार हेतु कम से कम एक दो सूईयों का प्रयोग किया जाता है । नेचेल
एक्युपंचर में सूईयो को चुभाने पर र्दद बिलकुल नही होता एंव परिणाम भी जल्दी एवं
आशानुरूप मिलते है । इस नेवल एक्युपंचर का उपयोग अब नेवल होम्योपंचर के रूप में
होने लगा है जिसमें होम्योपैथिक की शक्तिकृत दवाओं को बारीक डिस्पोजेबिल निडिल
के चैम्बर में भर कर नेवल के आस पास पाये जाने वाले एक्युपंचर पाईन्ट पर पंचरिक
कर उपचार किया जाता है ।
नेवेल क्षेत्र में
पाये जाने वाले एक्युपंचर पाईट का लाभ:-
1-नेवेल (नाभी)क्षेत्र में पाये जाने वाले
एक्युपंचर पाईन्ट सम्पूर्ण शरीर का प्रतिनिधित्व करते है अर्थात हमारे शरीर के
सम्पूर्ण अंतरिक अंगों की नाडीयॉ इस क्षेत्र पर पाई जाती है ।
2-इस क्षेत्र में मसल्स अधिक होने से
सुरक्षित पंचरिग(सूई चुभाई)किया जा सकता है ।
3-इस क्षेत्र में मसल्स अधिक होता है एंव
आर्टरी वेन या हडडीयॉ तथा अन्य अंतरिक अंग कम या काफी गहराई में होते है । इससे
सूई चुभाने पर किसी भी प्रकार का खतरा नही होता है ।
4-शरीर के समस्त अंतरिक अंगों की नाडीयॉ
इसी क्षेत्र से होकर गुजरती है अत: एक्युपंचर पाईन्ट का निर्धारण करने में
अनावश्यक समय की बरबादी नही होती ।
5-इस क्षेत्र में पंचरिंग पाईट आसानी से
मिल जाते है जो पंचरिग करने में काफी सुरक्षित होने साथ मरीज को र्दद नही होता ।
6-इस क्षेत्र में पंचरिंग कर उपचार करने से
परिणाम यथाशीघ्र एंव आशानुरूप प्राप्त होते है ।
7-महिलाओं में बाझपंन के उपचार में यहॉ पर
पाये जाने वाले पाईन्ट काफी कारगर सिद्ध हुऐ है।
8-सौन्द्धर्य समस्याओं के निदान में ब्यूटी
क्लीनिक में नेवल एक्युपंचर का प्रचलन काफी बढा गया है।
9-नेवेल एक्युपंचर में डिस्पोजेबिल निडिल
न0 26 या 27 का प्रयोग किया जाता है जो अत्यन्त बारीक होने के साथ इसकी लम्बाई
दो से तीन सेन्टीमीटर तक होती है । मरीज के मसल्स परिक्षण पश्चात इसे एक या डेढ
से0मी तक ही चुभाया जाता है ।
10-सूईयॉ डिस्पोजेबिल होती है अत: एक बार
प्रयोग कर उसे नष्ट कर दिया जाता है ।
11-नाभी का सम्बन्ध भावनाओं अर्थात मन से
होता है इसके बाद शरीर से होता है इसलिये यह मन और शरीर दोनो का उपचार करती है ।
नेवल एक्युपंचर एक संम्पूर्ण चिकित्सा पद्धति है एंव एक्युपंचर चिकित्सा से सरल तथा शीघ्र आशानुरूप परिणाम देने वाली है । नेवल एक्युपंचर तथा नेवल होम्योपंचर की जानकारीयॉ नेट पर उपलब्ध है गुगल साईड पर Navel Acupanthure या नेवेल होम्योपंचर टाईप कर इसे देखा जा सकता है । ब्यूटी क्लीनिक में नेवल एक्युपंचर एंव नेवल होम्योपंचर का समान रूप से सौन्द्धर्य समस्याओं के निदान में प्रयोग किया जा रहा है । ब्लागर की इस साईड पर भी जानकारीयॉ उपलब्ध है http://beautyclinict.blogspot.in
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परामर्श हेतु आप सुबह 10 बजे से 4 बजे तक फोन कर सकते है
साईड-https://jjehsociety.blogspot.com
तम्बाखू के नियमित सेवन से कैंसर डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल
तम्बाखू के नियमित सेवन से कैंसर 
तम्बाखू के नियमित सेवन से
कैंसर होने की संभावना बढती जा रही है । हमारे देश में इसकी संख्या चौकाने वाली
है । बच्चों से लेकर बडे बुर्जूर्गो में तम्बाखू खाने के प्रकरण हमारे देश में
अधिक मिलेगे । तम्बाखू के नियमित सेवन से मुंह में छाले होने लगते है धीरे धीरे
यह फाईब्रोसेस कैंसर की अवस्था में तबदील होने लगते है जब तक इसका पता चलता है
बहुत देर हो चुंकी होती है । अत: समय रहते तम्बाखू का सेवन बन्द कर देना चाहिये
। परन्तु यह इतना आसान नही है एक बार तम्बाखू सेवन की लत लग जाये तो इससे बचना
प्राय असंभव है । परन्तु दृड इक्च्दा शक्ति एंव कुछ नये प्रयासों से इससे बचा
जा सकता है ।
बचाव :- यदि तम्बाखू खाने की प्रबल इक्च्छा हो एंव मुंह में छाले हो रहे हो तो आप निम्न प्राकृतिक साधन का प्रयोग कर कैसर एंव तम्बाखू खाने की प्रबल इक्च्छा से बच सकते है । अदरक एंव नीबू में कैंसर ग्रोथ एंव कैंसर सेल्स को खत्म करने का अदभुत गुण होता है । इसके नियमित कुछ दिनों तक सेवन करने से कैंसर से बचा जा सकता है ।
तम्बाखू खाने की प्रबल इक्च्छा:- ऐसे व्यक्ति जिन्हे तम्बाखू खाने की प्रबल इक्च्छा हो उन्हे अदरक के गुटका का प्रयोग करना चाहिये । इसे आप अपने घर पर बना सकते है इसके लिये आप अदरक को छोटे से छोटे टुकडे में कॉट लीजिये इसके बाद इसमें नीबू का रस इतना मिलाये जिससे यह पूरी तरह से उसमें डूब जाये इसमें इतना सेधा नमक मिलाये तथा इसे छाये में सूखने के लिये रख दीजिये परन्तु ध्यान इस बात का रखे कि इसे ढके नही अन्यथा अदरख खराब हो जायेगा उसमें फॅफूदी पड सकती है इसलिये इसे बिना ढॅके छॉये में सूखने दे गर्मीयों के दिनों में यह तीन चार दिन बाद यह पूरी तरह से सूख जायेगा । इसके बाद जब आप को पूरी तरह से विश्वास हो जाये कि यह पूरी तरह से सूख गया है अब इसे आप कि खाली बन्द डिब्बे में रख लीजिये । आप का अदरक व नीबू का खुटका तैयार है ।
जब भी आप को तम्बाखू खाने की इक्च्छा हो इसकी इतनी मात्रा जितनी आप तम्बाखू की लेते है मुंह में डाल कर धीरे धीरे चूंसते जाये व अन्त में इसे चबा ले । इसका स्वाद बहुत अच्छा लगेगा । इसे रात्री में सोते समय भी मुंह में रख कर चूसते रहे एंव सुबह इसे अच्छी तरह से चबा कर खॉ लीजिये ।
इसके नियमित सेवन से मुंह के छाले एंव कैंसर से मुक्ती मिल जायेगी । यह अजमाया हुआ नुस्खा है । इससे काफी लोगों को लाभ हुआ है । फिर इसमें खर्च ही कितना है फिर इसे एक बार अजमाने में नुकसान क्या है । पहले आप उपयोग करले यदि लाभ नजर आये तो अपने अन्य मित्रों को इसके सेवन की सलाह दीजिये ।
इस प्रकार की जनकल्याणकारी जानकारी को अपने
अधिक से अधिक मित्रों को सोशल साईड पर सेन्ड करे ताकि कैंसर व मुंह में छॉले से ग्रस्ति व्यक्ति इससे लाभ उठा सके ।
जन जागरण नशामुक्ति केन्द्र
जन जागरण एजुकेशनल एण्ड हेल्थ वेलफेयर
सोसायटी सागर म0प्र0
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डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल (बी0 एच0 एम0 एस0,एम0डी)
जन जागरण धमार्थ चिकित्सालय
हीरो शो रूम के सामने नर्मदा बाई स्कूल के
पास बण्डा रोड मकरोनिया सागर म0प्र0 मकरोनिय
क्वान्टम थेवरी डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल
क्वान्टम थेवरी
क्वान्टम थेवरी :- जहॉ से भौतिक वस्तुओं
का अस्तित्व समाप्त होने लगता है वहॉ से सूक्ष्म अर्थात क्वान्टम थैवरी का
सिद्धान्त प्रारम्भ होने लगता है । यहॉ
पर हमारे वस्तु शब्द का प्रयोग करने का तात्पर्य है चूंकि भौतिक वस्तु से है ,
जबकि अध्यात्म में दो प्रकार के अस्तित्व का विवरण है उनका मानना है कि हमारे
शरीर में भौतिक शरीर तथा सूक्ष्म शरीर वि़द्यमान है । भौतिक वस्तु वह है जो
दिखलाई देती है एंव समय के साथ उसका अस्तित्व नष्ट हो जाता है जबकि सूक्ष्म वस्तु
का अस्तित्व समाप्त नही होता वह अपना रूप बदलती है । जिस प्रकार से भौतिक वस्तु
का मान सख्यात्मक रूप से बढता है उसी प्रकार सूक्ष्म वस्तु की मात्रा जितनी कम
होती जाती है उसका क्वान्टम मान सख्यात्मक रूप से बढता चला जाता है । जिस
प्रकार से भौतिक वस्तुओं के सख्यात्मक मान से उसका आकलन किया जाता है ठीक उसी
प्रकार से सूक्ष्म वस्तुओं के घटते क्रम के मान का संख्यात्मक आंकलन किया जाता
है । भौतिक वस्तुओं का बढतें क्रम से उस वस्तु को धनात्मक वृद्धि के अनुसार
र्दशाते है । परन्तु सूक्ष्म वस्तु के मान में उसकी संख्या को घटते क्रम के
मान से दृशाते है ,परन्तु सूक्ष्म वस्तु के कान में उसकी संख्या को घटते क्रम
के मान से दृशाते है भौतिक एंव सूक्ष्म एक के बढते क्रम एंव दुसरे के घटते क्रम
को घनात्मक रूप से वृद्धि के क्रम में ही माना जायेगा ,जैसे यदि किसी बस्तु के
भार में वृद्धि होती जाती है तो उसका संख्यात्मक मान बढता चला जाता है जैसे एक
ग्राम से वह दो ग्राम फिर तीन ग्राम क्रमश: इसी प्रकार से बढती जाती है , ठीक इसी
प्रकार से यदि किसी बस्तु का भौतिक अस्तित्व समाप्त हो कर वह जितनी सूक्ष्म
होती जाती है उसकी सूक्ष्मता का मान ठीक इसी प्रकार से कम होता जाता है ,परन्तु
इस सूक्ष्म से अति सूक्ष्म वस्तु जो अब वस्तु नही रही बल्की इतनी सूक्ष्म हो
गयी कि उसका अपना भौतिक अस्तित्व नही रहा परन्तु मात्र भौतिक अस्तित्व के न
रहने से उसका अस्तित्व समाप्त नही हो जाता बल्की उसका अस्तित्व व उसके कार्य
करने की क्षमता भौतिक वस्तु से कई गुना बढ जाती है । परमाणुवाद का सिद्धान्त एंव
होम्योपैथिक की शक्तिकृत दवाये तथा आयुर्वेद के मर्दनम शक्ति आदि । क्वान्टम
थैवरी पर अभी वैज्ञानिकों का शोध कार्य चल रहा है एंव उन्होने माना है कि भौतिक
वस्तुओं को बार बार तोडने या उसे सूक्ष्म अति सूक्ष्म करने से वह अपने भौतिक
शक्ति से भी अधिक शक्तिशाली हो जाती है । भविष्य में नाभीकिय क्वान्टम का
सिद्धान्त रोग निवारण कि दिशा में एक नया अध्याय प्रारम्भ करेगी एंव रोग उपचार
को एक नई दिशा देगी
1-भौतिक- भौतिक वस्तु व भौतिक क्रियाये वे है जो
भौतिक रूप में होती है अर्थात जो दिखलाई देती है जिन्हे स्पर्श किया जा सकता है
एंव भौतिक वस्तु एक निश्चित समय में समाप्त हो जाती है ।
2-सूक्ष्म वस्तु :- सूक्ष्म वस्तु या
सूक्ष्म क्रियाये वे है जो सूक्ष्म होती है इतनी सूक्ष्म होती है जिन्हे देखा
नही जा सकता अर्थात अभौतिक होती है ,इन्हे स्पर्श नही किया जा सकता अर्थात ये
भौतिक न होकर सूक्ष्म अतिसूक्ष्म होती है । जैसे परमाणु विखण्डन का सिद्धान्त
।
क्वान्टम थैवरी
का सिद्धान्त ही सूक्ष्मता पर आधारित है अर्थात जब भौतिक रूप सूक्ष्म रूप में
परिवर्तित होने लगती है वहॉ से क्वान्टम थैवरी का सिद्धान्त प्रारम्भ होता है
। वस्तु जितनी सूक्ष्म होती जायेगी उसकी सूक्ष्म गणना उतनी आगे बढती जायेगी एंव
उसमें मूल बस्तु की अपेक्षा कार्य करने की क्षमता अधिक होती जायेगी । सूक्ष्म
वस्तु में भौतिक रूप न होते हुऐ भी वह कार्य की दृष्टि से अतितीब्र होती है ।
आश्चर्यजनक है होम्योपैथिक
अब समय आ गया वैकल्पिक चिकित्सा का
पश्चिमोन्मुखी विचारधारा के अंधानुकरण ने कई जनोपयोगी, उपचार वि़द्यओं को अहत ही नही किया बल्की उनके अस्तित्व को भी खतरे में डाल रखा है ।
आज की मुख्यधारा से जुडी ऐलोपैथिक चिकित्सा जहॉ एक व्यवसाय का रूप धारण करती जा रही है, वही यह महगीं चिकित्सा, मध्यम एंव गरीब व्यक्तियों की पहुंच से दूर होती जा रही है । उपचार के इस व्यवसायीक भ्रमं जाल ने मुख्य चिकित्सा (अग्रेजी) पद्धतियों पर कई सन्देहात्मक प्रश्नों को रेखांकित किया है, परन्तु इस चिकित्सा पद्धति ने अपने नये नये अनुसंधान नई खोज से अनगिनित मरीजों की जान बचाई है, इस बात को कहने में भी कोई सन्देह नही है कि रोग की कई जटिल व विषम परस्थितियों में इसने रोगीयों को एक नया जीवन दान दिया है, परन्तु आज के इस व्यवसायिकरण के दौर में यह चिकित्सा पद्धति अपने चिकित्सा जैसे सेवा भाव, पुनित, जनकल्याण उदेश्यों से भटकती नजर आ रही है । रोग की जटिल व विषम परस्थितियों में यही एक मात्र सहारा है, इस लिये गलती इस उपचार या पैथी की नही बल्की इस पैथी को साधन सम्पन्न जीवकोपार्जन के लिये इसे व्यवसाय के रंगों में रंगना गलत है ।
महॅगे से मंहॅगे परिक्षण अब एक चिकित्सकीय आवश्यकता बनती जा रही है ,इसके पीछे देखा जाये तो चिकित्सक या चिकित्सा संस्थाओं का स्वार्थ अधिक नजर आता है और यह बात मरीज भी समक्षते है परन्तु वो खामोश है । अग्रेजी चिकित्सा उपचार प्रक्रियाओं के व्यवसायीक प्रतिस्पृद्धा की दौड में दवा निर्माता कम्पनीयॉ भी पीछे नही है, उनकी व्यवसायीक प्रतिस्पृद्ध ने सस्ती सुलभ औषधियों के मूल्यों को दुगना, चौगना ही नही, बल्की कई गुना बढा दिया है । आज छोटे से लेकर बडे से बडा डॉ0 जेनरिक दवाये न लिखकर ब्रान्डेड दवाये लिखते है उपचार की इन दोनों प्रक्रियाओं का बोझ सीधे मरीज व उसके परिवार पर अनावश्यक आर्थिक भार पडता है । बात रोग परिक्षण की हो या कई गुना मंहगी दवाओं की हो सभी में डॉ0 का कमीशन तैय होता है ।
अब चलते है रोग उपचार के शाल्य क्रिया के फैलाये भंवरजाल की तरफ, चिकित्सा उपचार का यह भंवरजाल भी किसी जादूगर के भ्रमित इंद्रजाल से कम नही है, कभी कभी जहॉ शाल्यक्रिया (अपरेशन) की आवश्यकता न हो वहॉ कई चिकित्सक शाल्यक्रिया हेतु रोगी को विवश कर देते है । बडे बडे चिकित्सालयों के बडे से बडे खर्चो की पूर्ति का यह एक माध्यम होता है बडे से बडे चिकित्सालय अपने अस्पतालों के मेनेजमेन्ट के खर्च को मरीज के शाल्यक्रिया एंव उपचार जैसे पैसों के गणित से पूरा करने में नही चूंकते ।
ये बडे से बडे नामी चिकित्सक एंव चिकित्सालय अपरेशन या अस्पतालों की सुविधा अस्पताल में भर्ति, विभिन्न उपचारकर्ताओं की सेवायें आदि के नाम पर आर्थिक गणित के गुणा भाग के फार्मूला को पहले से ही तय कर चुके होते है ।
बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को आम जनता तक पहुंचाने में सरकारे विफल ही रही है । इसका सीधा प्रभाव आम जनता भुगत रही है वही शासकीय चिकित्सा सेवाओं के प्रति जन सामान्य का विश्वास कम होते परिणामों ने चिकित्सा के व्यवसायीकरण में अपना मौन योगदान ही नही दिया बल्की इसे अपने व्यवसायीक भंवारजाल को शासन की ऑखों के सामने फलने फूलने का पूरा पूरा मौका दिया है, यदि शासकीय स्कूल व चिकित्सालयों में गुणवत्ता पूर्ण ,भरोसेमंद सुविधायें उपलब्ध होती तो प्राईवेट स्कूल व प्राईवेट चिकित्सालायों के अनावश्यक खर्च के लिये जनता को भटकना नही पडता ।
राजनैतिक दले सत्ता की लोलुप्ता में कुंभकरण की नीद सो रही है, बुनियादी आवश्कताओं का ढांचा चरमाराते हुऐ देख, जनता अंधी, गूंगी ,बहरी बन तमाशा देख रही है, बडे बडे चिकित्सालयों के स्टेनिंग आपरेशन कर न्यूज चैनलों पर पोले खोली गई परन्तु धीरे धीरे बात आई और गयी होती चली गई ।
मुख्य धारा की चिकित्सा पद्धति को छोड कर तथाकथित अन्य चिकित्सा पद्धतियों को हॉसिये में नही रखा जा सकता, आज मुख्यधारा से जुडी चिकित्सा पद्धतियों के खर्चीले उपचार से तंग आकर जनता अन्य वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों की तरफ भाग रही है ,जिसके आशानुरूप परिणाम भी सामने आ रहे है ।
आज के इस व्यवसायीक प्रतिस्पृद्धा के युग में जहॉ शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य जैसी मूल भूत बुनियादी आवश्यकतायें व्यापार बनती जा रही है । बडा दु:ख होता है जब चिकित्सा जैसे पुनित कार्य को बडे बडे चिकित्सकों व चिकित्सालयों द्वारा धनार्जन का साधन बनाया जाता है । होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति सरल होने के साथ सस्ती सुलभ एंव सभी की पहूंच तक है । परन्तु पश्चिमोन्मुखी विचारधारा के अंधानुकरण की वजह से जन सामान्य का झुकाव ऐलोपैथिक चिकित्सा पर अधिक है । जब तक बडे से बडे परिक्षण व उपचार न हो जाये मरीज को भी तसल्ली नही मिलती ।
होम्योपैथिक चिकित्सा एक लक्षण विधान उपचार विधि है, इसमें किसी रोग का उपचार न कर लक्षणों (प्रबल मानसिक लक्षण,एंव व्यापक लक्षणों) का उपचार किया जाता है । इससे बडे से बडे रोगों का निवारण आसानी से हो जाता है, इसी प्रकार आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी कई रोगों का उपचार आसनी से बिना किसी अपरेशन या महगे परिक्षणों के हो जाता है । प्राकृतिक चिकित्सा ,योगा ,यूनानी व अन्य प्रचलित या अप्रचलित कई उपचार विधियॉ मुंख्यधारा की चिकित्सा पद्धति के सामने लाचार नजर आ रही है । इसका प्रमुख कारण शासन की नीतियॉ एंव जन सामान्य में प्रचार प्रसार का अभाव है ।
नि:शुल्क परामर्श हेतु आप सुबह 9 बजे से 2 बजे तक फोन कर सकते है ।
डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल (बी0 एच0 एम0 एस0,एम0डी)
जन जागरण धमार्थ चिकित्सालय
बजाज शो रूम के सामने नर्मदा बाई स्कूल के
पास बण्डा रोड मकरोनिया सागर म0प्र0 मकरोनिया
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अब समय आ गया वैकल्पिक चिकित्सा का डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल
अब समय आ गया वैकल्पिक चिकित्सा
का
पश्चिमोन्मुखी विचारधारा के अंधानुकरण ने
कई जनोपयोगी, उपचार वि़द्यओं को अहत ही नही किया बल्की उनके अस्तित्व को भी खतरे
में डाल रखा है ।
आज की मुख्यधारा से जुडी
ऐलोपैथिक चिकित्सा जहॉ एक व्यवसाय का रूप धारण करती जा रही है, वही यह महगीं
चिकित्सा, मध्यम एंव गरीब व्यक्तियों
की पहुंच से दूर होती जा रही है । उपचार के इस व्यवसायीक भ्रमं जाल ने मुख्य चिकित्सा
(अग्रेजी) पद्धतियों पर कई सन्देहात्मक प्रश्नों को रेखांकित किया है, परन्तु इस
चिकित्सा पद्धति ने अपने नये नये अनुसंधान नई खोज से अनगिनित मरीजों की जान बचाई
है, इस बात को कहने में भी कोई सन्देह नही है कि रोग की कई जटिल व विषम
परस्थितियों में इसने रोगीयों को एक नया जीवन दान दिया है, परन्तु
आज के इस व्यवसायिकरण के दौर में यह चिकित्सा पद्धति अपने चिकित्सा जैसे सेवा
भाव, पुनित, जनकल्याण
उदेश्यों से भटकती नजर आ रही है । रोग की जटिल व विषम परस्थितियों में यही एक
मात्र सहारा है, इस लिये गलती इस उपचार या पैथी की नही बल्की इस पैथी को साधन सम्पन्न
जीवकोपार्जन के लिये इसे व्यवसाय के रंगों में रंगना गलत है ।
महॅगे से मंहॅगे परिक्षण अब एक चिकित्सकीय
आवश्यकता बनती जा रही है ,इसके पीछे देखा जाये तो चिकित्सक या चिकित्सा संस्थाओं
का स्वार्थ अधिक नजर आता है और यह बात मरीज भी समक्षते है परन्तु वो खामोश है । अग्रेजी
चिकित्सा उपचार प्रक्रियाओं के व्यवसायीक प्रतिस्पृद्धा की दौड में दवा निर्माता
कम्पनीयॉ भी पीछे नही है, उनकी व्यवसायीक प्रतिस्पृद्ध ने सस्ती सुलभ औषधियों
के मूल्यों को दुगना, चौगना ही नही, बल्की कई गुना बढा दिया है । आज छोटे से
लेकर बडे से बडा डॉ0 जेनरिक दवाये न लिखकर ब्रान्डेड दवाये लिखते है उपचार की इन
दोनों प्रक्रियाओं का बोझ सीधे मरीज व उसके परिवार पर अनावश्यक आर्थिक भार पडता
है । बात रोग परिक्षण की हो या कई गुना मंहगी दवाओं की हो सभी में डॉ0 का कमीशन
तैय होता है ।
अब
चलते है रोग उपचार के शाल्य क्रिया के फैलाये भंवरजाल की तरफ, चिकित्सा उपचार का
यह भंवरजाल भी किसी जादूगर के भ्रमित इंद्रजाल से कम नही है, कभी कभी जहॉ शाल्यक्रिया
(अपरेशन) की आवश्यकता न हो वहॉ कई चिकित्सक शाल्यक्रिया हेतु रोगी को विवश कर
देते है । बडे बडे चिकित्सालयों के बडे से बडे खर्चो की पूर्ति का यह एक माध्यम
होता है बडे से बडे चिकित्सालय अपने अस्पतालों के मेनेजमेन्ट के खर्च को मरीज
के शाल्यक्रिया एंव उपचार जैसे पैसों के गणित से पूरा करने में नही चूंकते ।
ये बडे से बडे नामी चिकित्सक एंव चिकित्सालय
अपरेशन या अस्पतालों की सुविधा अस्पताल में भर्ति, विभिन्न उपचारकर्ताओं की
सेवायें आदि के नाम पर आर्थिक गणित के गुणा भाग के फार्मूला को पहले से ही तय कर
चुके होते है ।
बुनियादी
स्वास्थ्य सेवाओं को आम जनता तक पहुंचाने में सरकारे विफल ही रही है । इसका
सीधा प्रभाव आम जनता भुगत रही है वही शासकीय चिकित्सा सेवाओं के प्रति जन सामान्य
का विश्वास कम होते परिणामों ने चिकित्सा के व्यवसायीकरण में अपना मौन योगदान
ही नही दिया बल्की इसे अपने व्यवसायीक भंवारजाल को शासन की ऑखों के सामने फलने
फूलने का पूरा पूरा मौका दिया है, यदि शासकीय स्कूल व चिकित्सालयों में गुणवत्ता
पूर्ण ,भरोसेमंद सुविधायें उपलब्ध होती तो प्राईवेट स्कूल व प्राईवेट चिकित्सालायों
के अनावश्यक खर्च के लिये जनता को भटकना नही पडता ।
राजनैतिक दले सत्ता की लोलुप्ता में कुंभकरण
की नीद सो रही है, बुनियादी आवश्कताओं का ढांचा चरमाराते हुऐ देख, जनता अंधी, गूंगी
,बहरी बन तमाशा देख रही है, बडे बडे चिकित्सालयों के स्टेनिंग आपरेशन कर न्यूज
चैनलों पर पोले खोली गई परन्तु धीरे धीरे बात आई और गयी होती चली गई ।
मुख्य धारा की चिकित्सा पद्धति को छोड कर तथाकथित अन्य चिकित्सा पद्धतियों को हॉसिये में नही रखा जा सकता, आज मुख्यधारा से जुडी चिकित्सा पद्धतियों के खर्चीले उपचार से तंग आकर जनता अन्य वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों की तरफ भाग रही है ,जिसके आशानुरूप परिणाम भी सामने आ रहे है ।
आज के इस व्यवसायीक प्रतिस्पृद्धा के युग
में जहॉ शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य जैसी मूल भूत बुनियादी आवश्यकतायें व्यापार
बनती जा रही है । बडा दु:ख होता है जब चिकित्सा जैसे पुनित कार्य को बडे बडे
चिकित्सकों व चिकित्सालयों द्वारा धनार्जन का साधन बनाया जाता है । होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति सरल होने
के साथ सस्ती सुलभ एंव सभी की पहूंच तक है । परन्तु पश्चिमोन्मुखी विचारधारा के
अंधानुकरण की वजह से जन सामान्य का झुकाव ऐलोपैथिक चिकित्सा पर अधिक है । जब तक
बडे से बडे परिक्षण व उपचार न हो जाये मरीज को भी तसल्ली नही मिलती ।
होम्योपैथिक चिकित्सा एक लक्षण विधान उपचार विधि है, इसमें किसी रोग का उपचार न कर लक्षणों (प्रबल मानसिक लक्षण,एंव व्यापक लक्षणों) का उपचार किया जाता है । इससे बडे से बडे रोगों का निवारण आसानी से हो जाता है, इसी प्रकार आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी कई रोगों का उपचार आसनी से बिना किसी अपरेशन या महगे परिक्षणों के हो जाता है । प्राकृतिक चिकित्सा ,योगा ,यूनानी व अन्य प्रचलित या अप्रचलित कई उपचार विधियॉ मुंख्यधारा की चिकित्सा पद्धति के सामने लाचार नजर आ रही है । इसका प्रमुख कारण शासन की नीतियॉ एंव जन सामान्य में प्रचार प्रसार का अभाव है ।
नि:शुल्क
परामर्श हेतु आप सुबह 11 बजे से 2 बजे तक फोन कर सकते है
डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल (बी0 एच0 एम0 एस0,एम0डी)
धमार्थ चिकित्सालय
हीरो शो रूम के सामने नर्मदा बाई स्कूल के
पास बण्डा रोड मकरोनिया सागर म0प्र0 मकरोनिय
मो0-9300071924-9630309033
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नेवल एक्युपंचर बनाम नेवल होम्योपंचर
नेवल एक्युपंचर बनाम नेवल होम्योपंचर
नेवल
एक्युपंचर एक्युपंचर की नई खोज है इसकी खोज व इसे नये स्वरूप में सन 2000 में
कास्मेटिक सर्जन मास्टर आफ-1 चॉग के मेडिसन के प्रोफेसर योंग क्यू द्वारा की
गयी । यह चाईनीज एक्युपंचर चिकित्सा फिलासफी पर आधारित चिकित्सा है जो
टी0सी0एम0 (ट्रेडिशनल चाईनीज मेडिसन) र आधारित है । जैसा कि एक्युपंचर चिकित्सा
में शरीर पर हजारों की संख्या में एक्युपंचर पाईन्ट पाये जाते है एंव रोग
स्थिति के अनुसार चिकित्सक इन पाईन्ट की खोज करता है, फिर उस निश्चित पाईन्ट पर
एक्युपंचर की बारीक सूईयों को चुभा कर उपचार किया जाता है । चूकि एक तो चिकित्सक
के समक्क्ष एक्युपंचर के हजारों पाईन्टस में से निर्धारित पाइन्ट को को खोजना फिर उक्त निर्धारित पाईन्ट पर
रोग स्थिति के अनुसार दस पन्द्रह बारीक सूईयों को चुभोना एक जटिल प्रक्रिया है ।
डॉ0 योंग क्यू ने महसूस किया कि नेवेल व उसके आस पास के क्षेत्रों पर सम्पूर्ण
शरीर के एक्युपंचर पाईन्ट पाये जाते है,
जिन्हे खोजना आसान है साथ ही किसी भी प्रकार के रोग उपचार हेतु कम से कम सूईयों
को चुभाकर सफलतापूर्वक परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
उन्होने सन 2000 में अपने इस नये शोध को कई पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित
कराया साथ ही उन्होने इसका प्रशिक्षण कार्य प्रारम्भ कर इसके परिणामों से चिकित्सा
जगत को परिचित कराया । एक्युपंचर चिकित्सकों को पूर्व की तरह से सम्पूर्ण शरीर
में हजारों की संख्या में पाये जाने वाले एक्युपंचर पाईट के साथ कम से कम सूईयों
को चुभा कर उपचार करने में काफी सफलता मिली
नेवल एक्युपंचर में नाभी व इसके चारों तरफ के क्षेत्रों पर कम से कम
सूईयों को चुभाकर उपचार किया जाता है । इस उपचार
विधि का एक लाभ और भी था जो एक्युपंचर चिकित्सक वर्षो से महसूस करते आये
है जैसा कि रोग स्थिति के अनुसार सम्पूर्ण शरीर में कही भी एक्युपंचर पाईन्ट
पाये जाते है उपचार हेतु इन पाईन्ट पर सूईयॉ चुभाकर उपचार किया जाता है कभी कभी
कई ऐसे भी पाईन्ट होते है जिन पर सूईयों का लगाना काफी खतरनाक होता है । जैसे गले
के पास या ऑखो के चारो तरुफ या फिर सीने के पास खोपडी या कान के पिछले भागों में
या ऐसे स्थानो पर जहॉ पर मसल्स कम या त्वचा मुलायम होती है या फिर कई नाजुक स्थानों
पर । नेवेल एक्युपंचर में जैसा कि पहले ही बतलाया जा चुका है कि इसमें केवल नेवेल
व उसके चारों तरुफ पाये जाने वाले पाईन्ट पर बारीक सूईयों को चुभाकर उपचार किया
जाता है । पेट पर नेवल के चारों तरफ प्रयाप्त
मात्रा
में मसल्स होते है फिर इन क्षेत्र में शरीर के आंतरिक(खतराक) हिस्से मसल्स के
काफी नीचे होते है । अत: इन भाग पर पंचरिंग करने से किसी भी प्रकार का खतरा नही
होता । इसका कारण यह है कि पेट पर लगभग एक इंच से लेकर दो या आधिक चरर्बी है तो और
भी नीचे आंतरिक अंग होते है । अत:इस भाग पर पंचरिग करने से किसी भी प्रकार का खतरा नही होता । नेवल एक्युपंचर
में सूईयो को आधे इंच से या इससे भी कम मसल्स के अन्दर डाली जाती है मल्सल्स के
अन्दर कितनी सूई को धुसाना है इसके लिये रोगी के पेट की मसल्स का पहले परिक्षण
कर यह मालूम कर लिया जाता है कि पेट पर कितनी मोटी मसल्स की परत है । फिर उसके
हिसाब से सूई
को
इस प्रकार से चुभाते है ताकि मसल्स के आधे भाग तक ही सूई जाये ताकि पेट के आंतरिक अंगों पर सूई का प्रभाव न
हो ।
नेवल
एक्युपंचर चिकित्सको का मानना है कि शरीर के सम्पूर्ण आंतरिक एंव वाहय अंगों के
चैनल इस पांईन्ट से हो कर गुजरते है , जैसा कि हमारे प्राचीनतम आयुर्वेद मे कहॉ
गया है कि नाभी से हमारे शरीर की 72000 नाडीयॉ निकलती है । नेवल एक्युपंचर चिकित्सा
सरल होने के साथ पंचरिग भी सुरक्षित है एंव उपचार हेतु कम से कम एक दो सूईयों का
प्रयोग किया जाता है । नेचेल एक्युपंचर में सूईयो को चुभाने पर र्दद बिलकुल नही
होता एंव परिणाम भी जल्दी एवं आशानुरूप मिलते है । इस नेवल एक्युपंचर का उपयोग
अब नेवल होम्योपंचर के रूप में होने लगा है जिसमें होम्योपैथिक की शक्तिकृत
दवाओं को बारीक डिस्पोजेबिल निडिल के चैम्बर में भर कर नेवल के आस पास पाये जाने
वाले एक्युपंचर पाईन्ट पर पंचरिक कर उपचार किया जाता है ।
नेवेल क्षेत्र में पाये जाने वाले एक्युपंचर पाईट का लाभ:-
1-नेवेल
(नाभी)क्षेत्र में पाये जाने वाले एक्युपंचर पाईन्ट सम्पूर्ण शरीर का
प्रतिनिधित्व करते है अर्थात हमारे शरीर के सम्पूर्ण अंतरिक अंगों की नाडीयॉ इस
क्षेत्र पर पाई जाती है ।
2-इस
क्षेत्र में मसल्स अधिक होने से सुरक्षित पंचरिग(सूई चुभाई)किया जा सकता है ।
3-इस
क्षेत्र में मसल्स अधिक होता है एंव आर्टरी वेन या हडडीयॉ तथा अन्य अंतरिक अंग
कम या काफी गहराई में होते है । इससे सूई चुभाने पर किसी भी प्रकार का खतरा नही
होता है ।
4-शरीर के समस्त अंतरिक
अंगों की नाडीयॉ इसी क्षेत्र से होकर गुजरती है अत: एक्युपंचर पाईन्ट का
निर्धारण करने में अनावश्यक समय की बरबादी नही होती ।
5-इस क्षेत्र में पंचरिंग
पाईट आसानी से मिल जाते है जो पंचरिग करने में काफी सुरक्षित होने साथ मरीज को
र्दद नही होता ।
6-इस क्षेत्र में पंचरिंग
कर उपचार करने से परिणाम यथाशीघ्र एंव आशानुरूप प्राप्त होते है ।
7-महिलाओं में बाझपंन के
उपचार में यहॉ पर पाये जाने वाले पाईन्ट काफी कारगर सिद्ध हुऐ है।
8-सौन्द्धर्य समस्याओं
के निदान में ब्यूटी क्लीनिक में नेवल एक्युपंचर का प्रचलन काफी बढा गया है।
9-नेवेल एक्युपंचर में
डिस्पोजेबिल निडिल न0 26 या 27 का प्रयोग किया जाता है जो अत्यन्त बारीक होने
के साथ इसकी लम्बाई दो से तीन सेन्टीमीटर तक होती है । मरीज के मसल्स परिक्षण
पश्चात इसे एक या डेढ से0मी तक ही चुभाया जाता है ।
10-सूईयॉ डिस्पोजेबिल
होती है अत: एक बार प्रयोग कर उसे नष्ट कर दिया जाता है ।
11-नाभी का सम्बन्ध
भावनाओं अर्थात मन से होता है इसके बाद शरीर से होता है इसलिये यह मन और शरीर दोनो
का उपचार करती है ।
नेवल एक्युपंचर एक संम्पूर्ण
चिकित्सा पद्धति है एंव एक्युपंचर चिकित्सा से सरल तथा शीघ्र आशानुरूप परिणाम
देने वाली है । नेवल एक्युपंचर तथा नेवल होम्योपंचर की जानकारीयॉ नेट पर उपलब्ध
है गुगल साईड पर Navel Acupanthure या नेवेल होम्योपंचर टाईप कर इसे देखा जा सकता है । ब्यूटी क्लीनिक
में नेवल एक्युपंचर एंव नेवल होम्योपंचर का समान रूप से सौन्द्धर्य समस्याओं
के निदान में प्रयोग किया जा रहा है । ब्लागर की इस साईड पर भी जानकारीयॉ उपलब्ध
है http://beautyclinict.blogspot.in
डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल (बी0 एच0 एम0 एस0)
धमार्थ चिकित्सालय
बजाज शो रूम के सामने नर्मदा बाई स्कूल के
पास बण्डा रोड मकरोनिया सागर म0प्र0 मकरोनिय
मो0-9300071924-9630309033
3- इलैक्ट्रो होम्योपैथिक
3- इलैक्ट्रो होम्योपैथिक
पैरासेल्सस के प्रथम सिद्धान्त ‘ सम से सम की चिकित्सा ’ पर डॉ0 हैनिमैन सहाब ने होम्योपैथिक चिकित्सा का आविष्कार किया, वही उनकी मृत्यु के पश्चात सन 1865 ई0 में पैरासेल्सस के दूसरे सिद्धान्त ‘ वनस्पति जगत में विद्युत शक्ति विद्यमान ’ होती है । इस दूसरे सिद्धान्त पर इलैक्ट्रो होम्योपैथिक का आविष्कार बोलग्ना इटली निवासी डॉ0 काऊट सीजर मैटी ने किया था ।
इलैक्ट्रो होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के दो सिद्धान्त है
1-वनस्पति जगत में वि़द्धुत शक्ति विधमान होती है
2- रस और रक्त की समानता एंव शुद्धता
मैटी सहाब ने हानिरहित वनस्पतियों की वि़द्धुत शक्ति की खोज करते हुऐ 114 वनस्पतियों के अर्क को कोहेबेशन प्रक्रिया से निकाल कर 38 मूल औषधियों का निर्माण किया जो मनुष्य के रस एंव रक्त के दोषों को दूर कर उन्हे शुद्ध व सम्यावस्था करती है , उन्होने उक्त औषधियों के निर्माण में शरीर के अंतरिक अंगों पर कार्य करने वाली औषधियों के समूह का निर्माण किया जिन्हे आपस में मिला कर मिश्रित कम्पाऊंउ दवा बनाई गई इस प्रकार इनकी संख्या बढकर कुल 60 हो गयी है ।
इसे सुविधा व कार्यो की दृष्टि से निम्न समूहो में विभाजित किया जा सकता है । इस विभाजन में मूल औषधियों के साथ मिश्रित किये गये कम्पाऊड की संख्या भी सम्मलित है ।
1- स्क्रोफोलोसोज :-प्रथम वर्ग में रस पर कार्य करने वाली मेटाबोलिज्म को संतुलित एंव उसके कार्यो को सामान्य रूप से संचालित करने वाली एक क्रियामिक औषधिय है जो रस तथा पाचन सम्बन्धित अव्यावों पर कार्य करती है औषधियों को रखा जो स्क्रोफोलोसोज नाम से जानी जाती है एंव संख्या में कुल 13 है ।
स्क्रोफोलोसो लैसेटिबों :- इसमें एक दवा स्क्रोफोलोसो लैसेटिबों सम्मलित है इसका कार्य कब्ज को दूर करना तथा ऑतों की नि:सारण क्रिया को प्रभावित करना है
2-
एन्जिओटिकोज :- दूसरे वर्ग में रक्त पर कार्य करने वाली , औषधियों को रखा जो एन्जिओटिकोज के नाम से जानी
जाती है इस समूह में कुल 5 औषधियॉ है ।
3- लिन्फैटिकोज :-तीसरे वर्ग में रक्त एंव रक्त दोनो पर कार्य करने वाली औषधियों को रखा गया जो लिन्फैटिकोज नाम से जानी जाती है इस समूह में 2 औषधियॉ है
4- कैन्सेरोसोज:- चौथे वर्ग में शरीर पर कार्य करने वाले अवयवों तथा सैल्स एंव टिश्यूज की बरबादी एंव उनकी अनियमिता से उत्पन्न होने वाले रोगों पर कार्य करती है रखा गया एंव यह कैन्सेरोसोज के नाम से जानी जाती है इस समूह में कुल 17 औषधियॉ है ।
5- फैब्रिफ्यूगोज :- पॉचवे वर्ग में वात संस्थान नर्व सिस्टम पर कार्य करती है इसे फैब्रिफ्यूगोज नाम से जाना जाता है इस समूह में कुल 2 औषधियॉ है ।
6- पेट्टोरल्स :- छठे वर्ग में श्वसन तंत्र पर कार्य करने वाली औषधियों को रखा गया जो पेट्टोरल्स के नाम से जानी जाती है एंव संख्या में 9 औषधियॉ है ।
7-वेनेरियोज –सातवे
वर्ग में वेनेरियोज यह औषधिय सक्ष्या में 6 है एंव इसका कार्य रति सम्बन्धित
,मूत्रसंस्थान ,जननेन्दीय पर प्रभावी है जिसका उपयोग रतिजन्य रोगो व जन्नेद्रीय
मूत्र संस्थान सम्बन्धित पर होता है ।
8-वर्मिफ्युगोज :–‘ इस वर्ग में में वर्मिफ्युगोज दवा का रखा गया जो संख्या में 2 है इस ग्रुप की दवा का प्रभाव विशेष रूप से ऑतों पर है एंव यह शरीर से किटाणुओं व कृमियों को शरीर से खत्म कर देती है
9- सिन्थैसिस:- इस समूह में सिन्थैसिस (एस वाय) है जो एक कम्पाऊड मेडिसन है जिसका उपयोग सम्पूर्ण शरीर के आगैनन को सुचारूप से संचालित करने हेतु प्रेरित करती है एंव उन्हे शक्ति प्रदान करती है इसे एस वाई या सिन्थैसिस नाम से जाना जाता है ।
10-इलैक्ट्रीसिटी:- इस
वर्ग में पॉच इलैक्ट्रीसिटी एंव एक तरल औषधिय अकुवा पैरिला पैली (ए0पी0पी) है ।
इसमें पॉच इलैक्ट्रीसिटी एंव एक त्वचा जल सम्मलित है जो क्रमश: निम्नानुसार है
।
1-व्हाईट इलैक्ट्रीसिटी :-इसे सफेद बिजली भी कहते है , इसकी क्रिया ग्रेट सिम्पाईटिक नर्व, सोरल फ्लेक्स,लधु मस्तिष्क तथा वात संस्थान के समवेदिक सूत्रों पर है ,इसलिये यह वातज निर्बलता की विशेष औषधिय है ,इसका प्राकृतिक गुण पीडा नाशक,शक्ति प्रदान करने बाली , नींद लाने वाली वातज पीडा को ठीक करने वाली एंव ठंडक पहुचाने वाली है । इसका वाह्रय एंव आंतरिक प्रयोग किया जाता है ।
2- ब्लू
इलैक्ट्रीसिटी :-इसे नीली बिजली भी कहते है ,यह रक्त प्रकृति के अनुकूल है
,इसका प्रभाव हिद्रय के बांये भाग पर है यह रक्त के स्त्राव को चाहे वह वाह्रय
स्थान या अंतरिक अवयव से हो उसे रोक देती है ,नीली बिजली क्योकि यह रक्त
नाडियों का सुकोड देती है इससे रक्त स्त्राव रूक जाता है । यह लकवा ,मस्तिष्क
में रक्त संचय ,चक्कर आना ,खूनी बबासीर , या शरीर से रक्त स्त्रावों के लिये
उपयोगी है ।
3-रेड इलैक्ट्रीसिटी:- इसे लाल बिजली भी कहते है, यह कफ प्रकृति वालों के अनुकूल है इसकी प्रकृति पीडा नाशक,बल वर्धक उत्तेजक,प्रदाह नाशक, ग्रन्थी रोग नाशक है । इसमें रक्त की मन्द गति को तीब्र करने का विशेष गुण है ।
4-यलो इलैक्ट्रीसिटी:- इसे पीली बिजली भी कहते है,यह कफ प्रकृति वालों के अनुकूल है इसकी प्रकृति पीडा नाशक, रक्त की कमी एंव ऐढन को दूर करने वाली, कै को रोकने वाली एंव कृमि नाशक है तथा वात सूत्रों को बल प्रदान करने वाली है । यह औषधिय बल वर्धक है तथा अन्य अपनी सजातीय औषधियों के साथ प्रयोग करने पर शरीर से पसीना लाने वाली है । वात सूत्रों ,ऑतों,और मॉस पेशियों पर इसका विशेष प्रभाव है ,मिर्गी,हिस्टीरिया,जकडन,पागलपन इत्यादि में एंव उष्णता को शान्त करने के लिये इसका प्रयोग होता है ।
5-ग्रीन इलैक्ट्रीसिटी:-इसे हम हरी बिजली भी कह सकते है ,यह रक्त प्रकृति वालों के लिये अनुकूल है इसका प्रभाव शिराओं एंव उनकी कोशिकाओं और हिद्रय के आधे दाहिने भाग की बात नाडियों पर है , इसकी क्रिया त्वचा ,श्लैष्मिककला पर होता है, इसके प्रयोग से किसी भी प्रकार के धॉव, चाहे वे सडनें गलने लगे हो उसमें इसका प्रयोग किया जाता है जैसे कैंसर, गैगरीन,दूषित धॉव बबासीर ,भगन्दर के ऊभारों में इसका प्रयोग किया जाता है । मस्स्ो ,चिट्टे इसके प्रयोग से झड जाते है यह जननेन्द्रिय या मूंत्र मार्ग से पीव निकलने पर अत्यन्त उपयोगी है । इसके प्रयोग से शरीर के अन्दर या बाहर किसी भी स्थान पर कैंसर हो जाये तो उसकी पीडा को यह दूर कर देती है ।
6-अकुआ पर ला पेली या ए0पी0पी :- इसे त्वचा जल के नाम से भी जाना जाता है इसका प्रयोग त्वचा को स्निग्ध, मुलायम, चिकनाई युक्त एंव सुन्दर स्वस्थ्य बनाने तथा त्वचा के रंग को साफ करने के लिये वाह्रय रूप से (त्वचा पर लगाना) उपयोग किया जाता है । इस दवा को ऑखों के चारों तरफ की त्वचा पर (ऑखों पर नही) लगाने से ऑखों को शक्ति मिलती है । इसका प्रयोग चहरे व त्वचा को चिकना मुलायम साफ चमकदार बनाने में तथा दॉग धब्बे झुरियों अथवा मुंहासे,चहरे के ब्लैक हैड, खुजली ,छीजन,त्वचा के रंग में परिवर्तन आदि में किया जाता है ।
है जो अपने रंगों के अनुसार वनस्पितियों से प्राप्त की गई है एंव इनका कार्य रोगों के निवारण में किया जाता है एंव इसके बडे ही आशानुरूप परिणाम प्राप्त होते है । इसमें एक त्वचा जल है जो त्वचा को निखरने एंव त्वचा दोषों पर प्रभावी औषधिय है ।
नि:शुल्क
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होम्योपैथिक
-
( होम्योपैथी के चमत्कार भाग -2 ) अध्याय-20 दॉतो के रोग क्र रोग ...



