होम्योपैथिक चिकित्सा

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वैकल्पिक चिकित्सा

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

पैथालाजी रोग एंव होम्‍योपैथिक (विकृति विज्ञान

  पैथालाजी रोग एंव होम्‍योपैथिक (विकृति विज्ञान

    होम्‍योपैथिक एक लक्षण विधान चि‍कित्‍सा पद्धति है इसमें किसी रोग का उपचार नही किया जाता बल्‍की लक्षणों को ध्‍यान में रखकर औषधियों का र्निवाचन किया जाता है । परन्‍तु कई पैथालाजी परिक्षण उपरान्‍त जब यह सिद्ध हो जाता है कि रोगी को बीमारी क्‍या है ऐसी अवस्‍था में लक्षणों को ध्‍यान में रख कर औषधियों का निर्वाचन तो किया ही जसतस है परन्‍तु पैथालाजी के परिणामों को ध्‍यान में रख निर्धारित औषधियों के प्रयोग से परिणाम भी आशानुरूप प्राप्‍त होते है । 


      रक्‍त में पाई जाने वाली कोशिकाओं की बनावट उसकी संख्‍या में वृद्धि या कमी से विभिन्‍न प्रकार के रोग होते है ।
        रक्‍त में तीन प्रकार की कोशिकायें पाई जाती है 

1-इथ्रोसाईट (आर बी सी )
2-ल्‍युकोसाईट (डब्‍लू बी सी )
3-थम्‍ब्रोसाईट (प्‍लेटलेटस )

            1-इथ्रोसाईट (आर बी सी ) लाल रक्‍त कणिकायें :-

लाल रक्‍त कणिकायें या  आर बी सी की संख्‍या के घटने बढने की दो अवस्‍थायें निम्‍नानुसार है ।
(अ) इथ्रोसाईटोसिस या पोलीसाईथिमिया (बहु लोहित कोशिका रक्‍तता या लाल रक्‍त कण का बढना) :-जब रक्‍त में आर बी सी की संख्‍या बढ जाती है तो ऐसी स्थिति को इथ्रोसाईटोसिस (बहु लोहित कोशिका रक्‍तता या लाल रक्‍त कण का बढना )या पॉलीसाईथिमिया कहते है ।
(ब) इथ्रोसाईटोपैनिया (लोहित कोशिका हास या लाल रक्‍त कण की कम होना) :- जब रक्‍त में लाल रक्‍त कणों की मात्रा घट जाती है तो ऐसी स्थिति को इथ्रोसाईटोपैनिया (लोहित कोशिका हास या लाल रक्‍त कण की कम होना)कहते है ।  

    2-ल्‍युकोसाईट (डब्‍लू बी सी )

    श्‍वेत रक्‍त कोशिकाये या डब्‍लू बी सी की संख्‍या के कम या अधिक होने की दो अवस्‍थाये निम्‍नानुसार है ।
(अ) ल्‍युकोसायटोसिस (श्‍वेत कोशिका बाहुलता या श्‍ेवत रक्‍त कणों की वृद्धि) :- रक्‍त में जब श्‍वेत रक्‍त कोशिकाओं की मात्रा बढ कर 10000 प्रतिधन मि मी से ऊपर पहूंच जाती है तो ऐसी स्थिति को श्‍वेत कोशिका बहुलता कहते है   स्‍वस्‍थ्‍य मनुष्‍य में इसकी संख्‍या 5000 से 9000 प्रतिधन मिली होती है परन्‍तु रोगजनक अवस्‍थाओं में इसकी संख्‍या बढ जाती है । रूधिर कैंसर जिसमें ल्‍यूकोसाईटस की संख्‍या बढ जाती है ।

(ब) ल्‍युकोपेनिया (श्‍ेवत कोशिका अल्‍पता या श्‍ेवत रक्‍त कणों का घटना ):- जब श्‍ेवत रक्‍त कोशिकाओं की संख्‍या घट कर 4000 प्रतिघन मी मी रक्‍त में कम हो जाती है तो ऐसी स्थिति को श्‍वेत कोशिका अल्‍पता या रक्‍त में श्‍वेत रक्‍त कणों का घटना ल्‍युकोपेनिया कहलाता है । 

ल्‍युकोसायटोसिस :- रक्‍त में जब श्‍वेत रक्‍त कोशिकाओं की मात्रा बढ कर 10000 प्रतिधन मि मी से ऊपर पहूंच जाती है तो ऐसी स्थिति को श्‍वेत कोशिका बहुलता कहते है   स्‍वस्‍थ्‍य मनुष्‍य में इसकी संख्‍या 5000 से 9000 प्रतिधन मिली होती है परन्‍तु रोगजनक अवस्‍थाओं में इसकी संख्‍या बढ जाती है ।

1-रक्‍त में डब्‍लू बी सी की अधिकता ल्‍यूकोसाईटोसिस :- यदि रक्‍त में डब्‍लू बी सी की अधिकता है तो ऐसी स्थिति में बैराईटा आयोड 30 शक्‍ती में छै: छै: घन्‍टे के अन्‍तराल से प्रयोग करने से उब्‍लू बी सी की मात्रा कम होने लगती है (डॉ0घोष)

 (अ) लाल रक्‍त कणिकाओं का बढना एंव श्‍वेत रक्‍त कणिकाओं का घटना :- डॉ0 घोष ने लिखा है कि बैराईटा म्‍योरटिका से शरीर की लाल रक्‍त कणिकाये घट जाती है और श्‍वेत कण बढ जाते है । 

 (ब) डब्‍लू बी सी बढने पर :- रक्‍त में श्‍वेत रक्‍त कण के बढने पर पायरोजिनम दबा का प्रयोग करना चाहिये ।

 (स) रक्‍त में डब्‍लू बी सी की अधिकता :- यदि रक्‍त में डब्‍लू बी सी की अधिकता के साथ ग्रन्थियों में गांठे हो तो आर्सेनिक एल्‍ब , आर्सैनिक आयोडेट 3 एक्‍स में प्रयोग करना चाहिये ,फेरम फॉस एंव नेट्रम म्‍यूर ,पिकरिक ऐसिड दबाओं का भी लक्षण अनुसार प्रयोग किया जा सकता है । डॉ0बोरिक ने लिखा है कि डब्‍लू बी सी की अधिकता में फेरम फॉस उत्‍तम दबा है उन्‍होने कहॉ है कि रक्‍त कणिका जन्‍य रोग एंव शिथिल मॉस पेशीय जन्‍य रोग आदि में आयरन प्रथम दबा है । लोहे की कमी जनित अवस्‍थाओं में आयरन देने अर्थात फेरम फॉस दवा देने से मॉस पेशियॉ सबल एंव रक्‍त वाहिनीय उपयुक्‍त चाप के साथ संकुचित होकर रक्‍त संचार में सुधार लाती है । यह दबा लाल रक्‍त कणों की कमी ,बजन व शक्ति की कमी में अच्‍छा कार्य करती है । कहने का अर्थ यह है कि रक्‍त में आयरन की कमी होने से रक्‍त सम्‍बन्धित जो भी व्‍याधियॉ होती है उसमें फेरम फॉस अच्‍छा कार्य करती है लाल रक्‍त कणों की कमी एंव श्‍वेत रक्‍त कणों की वृद्धि में इस दबा को 6 या 12 एक्‍स में लम्‍बे समय तक प्रयोग करना चाहिये । 

2-ल्‍युकोपेनिया (श्‍वेत रक्‍त कोशिका अल्‍पता ):- जब श्‍ेवत रक्‍त कोशिकाओं की संख्‍या घट कर 5000 प्रति धन मी मी रक्‍त में कम हो जाती है तो ऐसी स्थिति को ल्‍युकोपेनिया या श्‍वेत रक्‍त कोशिका अल्‍पता कहते है ।

1-यदि रक्‍त में श्‍वेत रक्‍त कण घटते हो :- यदि रक्‍त में डब्‍लू बी सी घटता हो तो ऐसी स्थिति में क्‍लोरमफेनिकाल दबा का प्रयोग किया जा सकता है । यह दबा प्रारम्‍भ में 30 या इससे भी कम शक्ति की दबा का प्रयोग नियमित एंव लम्‍बे समय तक लेते रहना चाहिये , लाभ होने पर धीरे धीरे उच्‍च से उच्‍चतम शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है 

 हीमोग्‍लोबीन :- स्‍वस्‍थ्‍य व्‍यक्ति के शरीर में रक्‍त के लाल पदार्थ को हीमोग्‍लोबीन कहते है हीमोग्‍लोबिन के प्रतिशत का गिर जाना रक्‍त अल्‍पता का कारण बनता है 100 एम एल में रक्‍त रंजक की मात्रा लगभग 15 ग्राम पाई जाती है । रक्‍त में हीमोग्‍लोबीन की कमी 

रक्‍त में हीमोग्‍लोबिन की कमी :-यदि रक्‍त में हिमोग्‍लोबिन की कमी है तो फेरम फॉस 3 एक्‍स या 6 एक्‍स शक्ति में प्रयोग करना चाहिये । 

लाल रक्‍त कणों की संख्‍या बढाने हेतु :- रक्‍त में लाल रक्‍त कणों की कमी को हिमोग्‍लोबिन की कमी कहते है । इस अवस्‍था में जिंकम मैटालिकम दबा का प्रयोग किया जा सकता है । कुछ चिकित्‍सक फेरम मेल्‍ट एंव फेरम फॉस दबा को लाल रक्‍त कणों की संख्‍या बढाने हेतु पर्यायक्रम से प्रयोग करते है । 

हिमोफिलीयॉ रक्‍त स्‍त्रावी प्रकृति :- हिमोफिलीयॉ में नेट्रम सिलि,फासफोरस दबाओं का प्रयोग किया जा सकता है ।

    (अ) रक्‍त स्‍त्राव डॉ नैश की इस करिश्‍माई दबा को रक्‍त स्‍त्राव में प्रयोग किया जाता है रक्‍त लाल चमकदार होता है यह शरीर के किसी भी स्‍वाभाविक अंगों से निकले जैसे नकसीर,उल्‍टी,लेट्रींग आदि इसमें मिलीफोलियम क्‍यू (मदर टिंचर) या 30 देने से लाभ होता है । 

रक्‍त में टॉक्‍सीन को दूर करना :- रक्‍त के टॉक्‍सीन को दूर करने के लिये बैनेडियम दवा का प्रयोग करना चाहिये इसके प्रयोग से रक्‍त के दूषित पदार्थ नष्‍ट हो जाते है इस दवा की क्रिया रक्‍त के दूषित पदार्थो को नष्‍ट करना तथा आक्‍सीजन देना है । इस दबा का प्रयोग निम्‍न शक्ति में नियमित व लम्‍बे समय तक प्रयोग करा चाहिये । 

चर्म रोगों में रक्‍त को शुद्ध करने हेतु :- चर्म रोग की दशा में रक्‍त को शुद्ध करने के लिये सार्सापैरिला दबा का प्रयोग किया जा सकता है । 

बार बार फूंसियॉ रक्‍त शोधक :- यदि बार बार फुंसियॉ हो तो गन पाऊडर का प्रयोग करना चाहिये इस दबा के प्रयोग से रक्‍त शुद्ध होता है यह रक्‍त को शक्ति देती है । 

गनोरिया :- डॉ0 सत्‍यवृत जी ने लिखा है कि गनोरिया में कैनाबिस सिटावम सी एम शक्ति में प्रयोग करना चाहिये । इस दबा का असर चार पॉच दिन बाद होता है उन्‍होने लिखा है कि यदि इससे भी परिणाम न मिले तो मदर टिन्‍चर में दबा देना चाहिये । 

प्रोस्‍टेट ग्‍लैन्‍डस :- डॉ0 कैन्‍ट कहते है कि प्रोस्‍टटे ग्‍लैड की डिजिटेलिस प्रमुख दबा है  

त्‍चचा में कही भी तन्‍तुओं की असीम वृद्धि :- त्‍वचा में कही भी तन्‍तुओं की असीम वृद्धि होने पर हाईड्रोकोटाईल 6 या 30 में देना चाहिये । 

नॉखून बाल व हडिडयों के क्षय में :- नॉखून , बाल व हडिडयों के क्षय में फोलोरिक ऐसिड दवा का प्रयोग करना चाहिये । 

गुर्दा रोग (नेफराईटिस) गुर्दा रोग:- जिसमें किडनी के नेफरान याने छन्‍ने में सूजन आ जाती है जिसके कारण रक्‍त छनता नही है एंव पेशाब की निकासी का कार्य उचित ढंग से नही होता ,इससे रक्‍त में यूरिया की मात्रा बढ जाती है । इसे गुर्दे की बीमारी में शरीर में सूजन आ जाती है । गुर्दे की इस बीमारीयों में निम्‍नानुसार दवाओं का चयन किया जा सकता है ।

    (अ) पेशाब में एल्‍बुमिन का आना :- पेशाब में एल्‍बुमिन आने पर हैलिबोरस दबा का प्रयोग किया जा सकता है इस अवस्‍था मे सार्सापेरिला दबा भी उपयोगी है ।

    (ब) पेशाब में यूरिक ऐसिड का बढना :- पेशाब की परिक्षा में क्‍लोराईड अंश घटता और यूरिक ऐसिड परिणाम में बहुत बढ जाये तो बैराईटा म्‍यूर का प्रयोग किया जाना चाहिये ।  

    (स) पेशाब में यूरिया अधिक बनने पर :- यदि पेशाब में यूरिया अधिक आने लगे तो कास्टिकम दबा का प्रयोग करना चाहिये (डॉ0 आर हूजेस) ।

    रक्‍त का एक स्‍थान में संचय होना (हाईपेरीमिया) :- रक्‍त के एक ही स्‍थान पर संचय होने को हाइपेरीमिया कहते है रक्‍त हीनता में कैल्‍केरिया फॉस के बाद फेरम फॉस दवा अच्‍छा कार्य करती है ऐसी स्थिति में फेरम फॉस तथा कैल्‍केरिया सल्‍फ का प्रयोग प्रयार्यक्रम से करना चाहिये । 

                        ऐपेण्डिक्‍स 

  एपेण्डिक्‍स पेट में दाहिनी तरफ एक नली होती है जो बडी ऑत से अन्तिम छोर से जुडी होती है इसका प्रयोग मानव शरीर में प्राय: नही होता ,इसका उपयोग ऐसे जानवरों में होता है जो भोजन आदि को स्‍टॉक कर लेते है एंव जुगाली करते हे । इस नलीका में प्रेशर या नलिका कमजोर होने की स्थिति में अधिक दबाओं आदि के कारण भोजन आदि इसमें फॅस कर सडने लगता हो या फिर अधिक दवाब के कारण इसके फटने का डर बना रहता है । यह हमारे शरीर का बेकार अंग है जिसका उपयोग नही है इसके कमजोर होने या भोज्‍य पदार्थो के फॅस जाने से इसमें कई प्रकार के उदभेद उत्‍पन्‍न हो जाते है । इससे पेट में दर्द होता है , यदि नलिका कमजोर हुई तो इसके फॅट जाने का खतरा बढ जाता है यह स्थिति अत्‍याधिक खतरनाक होती है । ऐपिन्‍डस के र्ददों व रोग स्थिति में निम्‍न दबाओं का प्रयोग किया जा सकता है । 

1- एपेण्डिक्‍स में आईरिस टक्‍ट 3 दवा को इस रोग की सर्वोत्‍कष्‍ट दबा है । 

2- एपेण्डिक्‍स की अवस्‍था में ब्राईयोनिया 200 एंव नेट्रम सल्‍फ 30 की दवा का प्रयोग करने पर अच्‍छे परिणा मिलते है । इससे र्दद भी दूर हो जाता है एंव रोग ठीक होने लगता है ब्रायोनिया 200 की दबा की एक खुराक प्रथम सप्‍ताह एं अगले सप्‍ताह एक खुराक 1 एम की देना चाहिये नेट्रम सल्‍फ 30 दबा का प्रयोग दिन में तीन बार लम्‍बे समय तक करना चाहिये । उपरोक्‍त ब्रायोनियॉ की दो मात्राये देने के बाद जब तक अगली दबा का प्रयोग न करे ऐसा करने पर यह देखे कि कब तक र्दद या रोग का आक्रमण दुबारा नही होता यदि सप्‍ताह में हो तो दूसरी मात्रा 1 एम में देना चाहिये । 




         डॉ0 सत्‍यम सिंह चन्‍देल 

            (बी एच एम एस)

अध्‍यक्ष जन जागरण एजुकेशनल एण्‍ड हेल्‍थ वेलफेयर 

 सोसायटी हीरो हॉण्‍डा शो रूम के पास मकरोनिया सागर म0प्र0

      E Mail- jjsociety1@gmail.com



    


                 पथरी 

पथरी रोग की प्रतिषेधक दबा (कैल्‍केरिया कार्ब) :- कैल्‍केरिया कार्ब पथरी रोग की प्रतिषेधक दबा है दो या तीन सप्‍ताह के अन्‍तर से 200 या उच्‍च शक्ति में सी एम आदि की एक मात्रा देना चाहिये इसके र्दद के समय रोगी को बहुत अधिक पसीना आता है । डॉ0सैण्‍डस मिल्‍स तथा हूाजेस लिखते है कि पित्‍त पथरी का कष्‍ट दूर करने के लिये कैल्‍केरिया कार्ब अत्‍युत्‍म दबा है उनका कहना है कि इस दवा को पन्‍द्रह पन्‍द्रह मिनट के अन्‍तर देकर देना चाहिये इससे तीन घंटे में दर्द दूर हो जायेगा । 

पथरी तथा गठिये में (आर्टिका यूरेंस क्‍यू) :- डॉ0 बर्नेट का कहना है कि पथरी और गठिये में कुछ दिनों तक आर्टिका क्‍यू में उपयोग करने से ठीक हो जाता है । 

मूत्र में पथरी (हाइड्रेजिंया क्‍यू) :- मूत्र पथरी के लिये हाईड्रजिंयॉ क्‍यू काफी महत्‍वपूर्ण दवा है । यह दवा फिर से होने बाले मूत्र पथरी को रोकने में सहायक है । 

पथरी सारसापैरिला (अनुभव केस डॉ0 केन्‍ट) :- मूत्राश्‍य की पथरी के लिये सारसापैरिला एक अच्‍छी दवा है सार्सापैरिला के रोगी के पेशाब का तलछट सफेद होता है तथा लाईकोपोडियम का लाल । इस सम्‍बन्‍ध में डॉ0 केन्‍ट का एक अनुभव विशेष महत्‍व रखता है उन्‍होने लिखा है कि एक वृद्ध व्‍यक्ति को मूत्राश्‍य में पथरी हो गयी थी शाल्‍य चिकित्‍सकों ने अपरेशन की तैयारी कर ली थी परन्‍तु उसने डॉ0केन्‍ट को बुलाया डॉ0 केन्‍ट ने उसके लक्षणों का अध्‍ययन कर उसे सारसापैरिला दिया रात भर कष्‍ट के पश्‍चात उसकी पथरी निकल गयी । कुछ चिकित्‍सकों की सलाह है कि सारसापैरिला 200 शक्ति में भी देकर देखना चाहिये । डॉ0 हेरिंग इस औषधि के बडे पक्षधर थे । पथरी तथा गुर्दे के दर्द की यह उत्‍तम दवा है रोगी की तकलीफे गर्म खाने पीने से बढती है किन्‍तु गर्म सेक से उसे आराम मिलता है यह इसका विशेष लक्षण है । 

मूत्र पथरी (कैंथरीस) :- मूत्र पथरी के लिये कैन्‍थरीस एक बहूमूल्‍य दबा है खॉस कर जब कि मूत्र नली में बहुत जोर का र्दद हो डॉ0घोष ने कहॉ है कि यह दबा मूत्र के वेग को बढा कर पथरी को बाहर निकाल देती है । इसी प्रकार मूत्र को बढा कर पथरी को निकालने में बरबेरिस तथा लाईकोपोडियम की भी एक अहम भूमिका है । 

गुर्दे में पाई जाने वाली पथरी (पोलीगोनम):- गर्दे में पाई जाने वाली पथरी के लिये पोलीगोनम एक अत्‍यन्‍त उत्‍तम दबा है । 

यूरेट आफ सोडा का गुर्दे में बैठने से गुर्दे की पथरी (साईलेसिया) :- डॉ सत्‍यवृत जी ने लिखा है कि कभी कभी यूरेट आफ सोडा गुर्दे में बैठ जाता है जिससे गुर्दे में पथरी बन जाती है डॉ0सुशलर का कहना है कि इस अवस्‍था में साईलेसिया यूरेट से मिलकर उसे धोल देती है एंव उसे शरीर से निकाल देती है इस लिये गुर्दे की पथरी व जोडों के दर्द में साईलैसिया लाभप्रद है ।
पथरी के बनने की प्रवृति को रोकने के लिये (चाईना) :- पथरी के बार बार बनने की प्रवृति को रोकने के लिये चाईना 6 में कुछ दिनों तक दिया जाना चाहिये । डॉ0 फैरिंगटन ने लिखा है कि बोस्‍टन के डॉ0 थेयर का कथन है कि पित्‍त पथरी की प्रवृति को रोकने के लिये चाईना 6 एक्‍स का कई महिनों तक प्रयोग करना चाहिये पहले 10 दि तक रोज फिर दो तीन दिन का अन्‍तर देकर दस दिनों तक दे इस प्रकार इसका प्रयोग कुछ लम्‍बे समय तक करते रहने पर पथरी बनने की प्रवृति ठीक हो जाती है । 

गॉल स्‍टोन या पित पथरी (कोलेस्‍टरीन 2,3 विचूर्ण) :- यह गॉल स्‍टोन से बना नोसोड दवा है डॉ0 बर्नेट और डॉ0 स्‍वान ने पित्‍त पथरी में इसे बहुत उपयोगी पाया है । डॉ0 यिंगलिग लिखते है कि पित्‍त पथरी के र्दद में रोगी के लक्षणों का मिल पाना बहुत कठिन होता है उन्‍होने इस र्दद में कोलेस्‍टरीन 3 एक्‍स शक्ति के विचूर्ण को बहुत उपयोगी पाया है । 

पित्‍त पथरी एंव मूत्र पथरी :- कैल्‍केरिया कार्ब तथा बरबेरिस ये दोनों दवाये पित्‍त पथरी एंव मूत्र पथरी दोनों में लाभप्रद है 

ओसियम कैनम (तुलसी के पत्‍ते का रस ) :- रोगी में यूरिक ऐसिड की प्रवृति पेशाब में लाल तल छट गुर्दे में र्दद खॉसतौर पर दाहिने तरफ ऐसी स्थिति में इस दवा का प्रयोग 6, 30 या 200 शाक्ति में इसका प्रयोग करना चाहिये । 

            मूत्र पथरी (यूरिन स्‍टोन) 

पेशाब में सफेद तल छट (हाइड्रैन्जिया) :- पेशाब में सफेद तल छट या खून के गुर्दे का र्दद खॉस कर बाई पीठ में र्दद मूत्र नली पर इसका विशेष प्रभाव है । इस दवा के पॉच से दस बूंद टिंचर दिन में तीन चार बार देना चाहिये । 

 पेशाब बहुत कम (सैलिडैगो) :- पेशाब बहुत कम आता है गुर्दे का र्दद रिनल कॉलिक पेट तथा मूत्राश्‍य तक जाता है इसके प्रयोग से कभी कभी कैथीटर के इस्‍तेमाल की भी जरूरत नही पडती टिंचर या 3 शक्ति में दवा का प्रयोग करे । 

मूत्र में लाल कण के तल छट बैठना (लाईकोपोडियम) :- इस दवा के रोगी के मूत्र में लाल कण के तल छट बैठ जाते है लाइकोपोडियम में लाल रंग का तलछट होता है । पेशाब करने से पहले कमर में र्दद होता है पेशाब कर चुकने के बाद र्दद बन्‍द हो जाता है । लाइकोपोडियम 200 शक्ति में देने से मूत्र पथरी बनने की प्रवृति रूक जाती है । 

लाइको0 से लाभ न हो और यूरिक ऐसिड बनने की प्रवृति (आर्टिका यूरेन्‍स :- अगर लाइकोपोडियम से लाभ न हो और रोगी मे यूरिक ऐसिड बनने की प्रवृति हो तो इससे लाभ होता है इस दबा को टिंचर में या 6 शक्ति में प्रयोग करना चाहिये । 

हर प्रकार की पथरी बिना अपरेशन के निकालने हेतु (कोलियस एरोमा) :- हर प्रकार की पथरी को यह दवा निकाल देती है यह दवा पथरी में बूंद बूंद पेशाब मूत्र में रेत की तरह कण आना मूत्र में रक्‍त आना दाहिनी ओर गुर्दे की सूजन में इस दवा का प्रयोग किया जाना चाहिये यह दबा पथरी को गलाकर मूत्र मार्ग से निकाल देती है इस दवा को मूल अर्क में प्रयोग करना चाहिये । 


                डॉ0 सत्‍यम सिंह चन्‍देल 

              बी0एच0एम0एस0एम.डी.

   अध्‍यक्ष जन जागरण एजुकेशनल एण्‍ड

हेल्‍थ वेलफेयर सोसायटी सागर

    पता:- वृन्‍दावन बार्ड गोपालगंज सागर म0प्र0 




  

वृद्धावस्‍था {डॉ0 सत्‍यम सिंह चन्‍देल}

                                 वृद्धावस्‍था  

    
  वृद्धावस्‍था कोई रोग नही है ,यह जीवन की सच्‍चाई है , परन्‍तु वृद्धावस्‍था मे कई प्रकार की समस्‍यायें आने लगती है । वैसे तो वृद्धावस्‍था को कोई टाल नही सकता परन्‍तु वृद्धावस्‍था में होने वाली कई समस्‍याओं का निराकरण होम्‍योपैथिक औषधियों से किया जा सकता है क्‍यो‍कि होम्‍योपैथिक एक लक्षण विधान चिकित्‍सा पद्धति है ।
     विटामिन सी और ई ये उम्र बढने की प्रक्रिया को रोकते है और इन्‍हे प्राकृतिक स्‍त्रोंतों से प्राप्‍त किया जाना चाहिये पोष्टिक तत्‍व बी -12 लौह फोलिक एसिड और तॉबा जैसे खनिज त्‍वचा की कोशिकाओं में रक्‍त आपूर्ति के लिये आवश्‍यक है इन्‍हे खजिजो से प्राप्‍त होने के स्‍त्रोंत सब्जिया अनाज मटर दुध मेवे फलिया आदि में पाया जाता है । 
0-समस्‍त शारीरिक प्रणाली का दोषपूर्ण होना(एम्‍ब्राग्रीसिया):- उन वृद्ध व्‍यक्तियों की महान औषधि है जिनकी समस्‍त शारीरिक प्रणालीयॉ दोषपूर्ण हो गयी हो एंव जो दुर्बलताओं से घिरे हो दुबले पतले युवक या दुबली पतली स्त्रीयॉ जो जवानी में ही बुढापे जैसी अवस्‍था में पहूंच जाती है 50 वर्ष की उम्र में 70 वर्ष की लगती हो बच्‍चे जो बूढे से लगे उनके अंगों में कमजोरी के कारण कॅपन ,विचार शक्ति की कमी वृद्ध लोगों में स्‍नायु दौर्बल्‍य हतोत्‍साह ,चक्‍कर आना ,घरेलू या मानसिक ,व्‍यापारिक हानि के कारण रात में सो नही सकता इसके रोगी को पीडित अंगों में पसीना आता है 
0-बुढापे की क्षीणता (बैराईटा कार्ब):- वैसे तो बैराईटा कार्ब दवा को मूर्खो की औषधिय कहॉ जाता है ,परन्‍तु रोग लक्षणों के अनुसार यह दवा वृद्धावस्‍था में होने वाली कई समस्‍याओं के निराकरण की एक अच्‍छी दवा है ,परन्‍तु इसका प्रयोग लक्षणनुसार ही करना उचित है । बुढापे की क्षीणता रोकने में भी इसके उपयोग की अनुशंसा कुछ चिकित्‍सकों ने की है परन्‍तु होम्‍योपैथिक में इसकी अन्‍य औषधियॉ भी है इसलिये लक्षणानुसार ही औषधियों का चयन किया जाना उचित है ।
समय से पहले बुढापा (बेसिलस) :- कुछ चिकित्‍सकों का अभिमत है कि समय से पहले बुढापे को रोकने के लिये बेसिलस दबा का प्रयोग किया जा सकता है । परन्‍तु हमारा अभिमत है कि इस दवा को प्रयोग करने से पहले लक्षणों का मिलान आवश्‍यक है ।
शरीर में सिलवटे पडना(सार्सपैरिला) :- वृद्ध मनुष्‍यों की भॉती शरीर के चमडे में सिलवटे पड जाना इसमें शरीर की अपेक्षा गर्दन अधिक पतली पड जाया करती है ।
लैपिस ऐल्‍बा - शरीर की चरबी क्षय होती है इस क्षय के साथ आयोडम की तरह जबरजस्‍त भूंख भी होती है लैपिस अन्‍य दवाओं की अपेक्षा जल्‍दी फायदा करती है ।
थियोसिनामीनम (रोडैलिन) थियोसिनेमाईन (2 एक्‍स प्रति दिन 1 ग्राम) :- यह दवा शरीर के कठोर तन्‍तुओं को हल करके उसमें लचक पैदा करती है । वृद्धावस्‍था में लचक न होने का परिणाम है जितनी लचक होगी उतनी ही जवानी होगी ।वैसे तो वृद्धावस्‍था को कोई टाल नही सकता । परन्‍तु औषधि से शरीर के तंतुओं का कडा पड जाने से कुछ न कुछ रोका जा सकता है । इस लिये नाडियों के कडेपन ऑखो के मोतिया बिन्‍द ऑखों की कार्निया की अस्‍वच्‍छता आदि के लिये यह उपयोगी है डॉ0 ए एस हार्ड का कहना है कि यह वृद्धावस्‍था के लिये उपयोगी है  उसे कुछ पीछे धकेल देती है (डॉ0 सत्‍ रोग तथा हो0 चि0) मेरूरज्‍जा के क्षय रोग कान में पीप होकर बहरा हो जाना ,कान की छोटी हडडी का संचालन बन्‍द हो जाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है । डॉ0 हार्ड के अनुसार यह दवा बुढापे को रोकती है
मेफाईटिस :- डॉ0 फैरिगटन लिखते है कि इस दबा का स्‍नायु संस्‍थान पर विशेष प्रभाव होता है जब व्‍यक्ति अत्‍यन्‍त शक्तिहीन हो गया हो तब निम्‍न शक्ति में देने से यह स्‍नायु संस्‍थान के लिये टॉनिक का काम करती है और शाक्तिहीनता को दूर करती है ।
आर्टिका यूरेन्‍स क्‍यू :- इस दवा के सेवन से वृद्धावस्‍था में नवीन बल का संचार होता है और मनुष्‍य कई वर्ष तक अधिक जी सकता है ।
लाईकोपोडियम 30- इसे वृद्ध पुरूषों की महौषधि कहॉ जाता है । जब धीरे धीर क्षीणता बढती जाये तब इस औषधिय का प्रयोग करना चाहिये ।
फॉसफोरस  शरीर में लोच कम होती जाये तब फॉसफोरस 30 देना चाहिये इस औषधिय की एक मात्रा सप्‍ताह में लेते रहने से जकडन कम हो जाती है । जिससे आयु बढ जाती है या कष्‍ट कम हो जाता है ।
समय से पहले बुढापा (ब्‍यूफो) :- समय से पहले बुढापा (बोरिक)
वृद्धजनों के थकने पर हाईड्रेस्टिक :- वयोवृद्ध जो सरलतापूर्वक थक जाने वाले लोग क्षीणकाय एंव दुर्बल व्‍यक्तियों के लिये हाईड्रैस्टिक विशेष रूप से लाभदायी है ।
संजीवनी शक्ति को प्रबल एंव मानसिक शारीरिक विकास हेतु  (एक्‍स रे) :- (एक्‍स रे 12 एक्‍स इससे भी उच्‍च्‍ शक्ति में) :- यह शारीरिक व मानसिक शक्ति को बढाती है और संजीवनी शक्ति को बल प्रदान करती है (डॉधोष )
डॉ0 बोरिक ने लिखा है कि इसमें कोशिका चयापचय उत्‍तेजित करने का गुण है मन तथा शरीर की प्रतिक्रियात्‍मक जैवी शक्ति को जागृत करती है दबे हुऐ लक्षणों को भीतर से बाहर लाती है विशेष रूप से उन लक्षणों को जो प्रमेह विष जनित तथा मिश्र संक्रमणों से उत्‍पन्‍न होते है
स्‍मरण शक्ति ( बैराईटा कार्ब ) :- वृद्धों की स्‍मरण शक्ति धटने पर बैराईटा कार्व एंव युवकों की स्‍मरण शक्ति घटने पर एनाकार्डियम दवा का प्रयोग करना चाहिये
जिनसेग  :-जिनसेंग को एरेलिया क्‍वीनकिफोलिया नाम से जाना जाता है ।इसे चमात्‍कारी जड के रूप में मान्‍यता मिली है कहते है इसका प्रतिदिन सेवन करने पर बुढापा बहुत देर से आता है । प्रख्‍यात लेखक खुशवन्‍त सिंह प्रतिदिन जिनसेंग का सेवन किया करते थे । हाथ सदा ठण्‍डा रहे कम्‍पन्‍न सुन्‍न अगुलियॉ सफेद कम उम्र में बुढापे के लक्षण जिनसेंग की प्रधान क्रिया स्‍थल रीड की मज्‍जा का निम्‍नाश है शरीर के नीचे का भाग वात से शुन्‍न हो जाता है पैर के तलबे सुन्‍न हो जाते है व अगूठे में तेज र्दद रहता है ।
वृद्धावस्‍था में कैल्‍केरिया कार्ब :- वृद्धावस्‍था में कैल्‍केरिया कार्ब दवा का उपयोग बार बार अधिक दिनों तक नही करना चाहिये (डॉ0बोरिक)
वृद्धावस्‍था की शिकायतो की महत्‍वपूर्ण दबा (कैल्‍केरिया फलोर) - वृद्धावस्‍था में चमडी में झुरूरीयॉ ,बालों का झडना, ऑखों की दृष्टि का घटते जाना ,सुनने की क्षमता कम होना ,दॉतों की दतंवेष्‍ट का कमजोर होना आदि शिकायतों पर बायोकेमिक औषधि कैल्‍केरिया फलोर का प्रयोग किया जाता है । चूंकि इस दवा के प्रयोग से वृद्धावस्‍था की कई शिकायतों का हल हो जाता है परन्‍तु इसके लम्‍बे समय तक प्रयोग करने से पथरी की शिकायत होने की संभावना बढ जाती है अत: इस दबा का प्रयोग कम शक्ति में अधिक लम्‍बे समय तक नही करना चाहिये इसकी होम्‍योपैथिक 30 शक्ति का प्रयोग कुछ समय छोड छोड कर लम्‍बे अंतराल से करना उचति है ।
डॉ0 डी पी रस्‍तोगी :- वृद्धावस्‍था में अब्‍सेन्‍ट माईन्‍ड की दशा में कोनियम,लाईकोपोडियम,अमोनियम कार्ब उपयोगी है ।
वृद्धावस्‍था में बच्‍चों जैसा व्‍यवहार करना (बैराईटा कार्ब) :- यदि वृद्धावस्‍था में बच्‍चों जैसा व्‍यवहार करने लगे तो बैराईटा कार्ब का प्रयोग करना चाहिये ।
सुनाई देने में परेशानी कम सुनाई देना :- वृद्धावस्‍था में यदि सुनाई देने में दिक्‍कत आ रही हो तो साईक्‍यूटा ,मैगकार्ब,पेट्रोलियम ,बैराईटाकार्ब ,फासफोरस दबाओ का उपयोग करना चाहिये । किसी भी समस्याओं के उपचार हेतु मोबाइल पर संम्पर्क कर सकते है । 
    
   डॉ0 सत्‍यम सिंह चन्‍देल
    बी0एच0एम0एस0, एम0डी0
जन जागरण चैरिटेबल क्लीनिक
हीरो शोरूम के पास बण्‍डा रोड
 मकरोनिया सागर म0प्र0
मो.न. 9926436304 ,9300071924



आश्‍चर्यजनक है होम्‍योपैथिक

      आश्‍चर्यजनक है होम्‍योपैथिक 


                                       हर चिकित्‍सा पद्धतियों का अपनी जगह महत्‍व है , होम्‍योपैथिक चिकित्‍सा में भी कई इस प्रकार के उपचार मौजूद है , जिन्‍हे हम प्राय: रोग की श्रेणी में न मान कर उसे नजर अंदाज कर देते है । जैसे बच्‍चें का गोद में धूमना नीचे उतारो तो रोने लगता है , बच्‍चों का अनावश्‍यक रोना एंव जिदद करना , गोद में धूमने के लिये जिदद करना , बच्‍चों बोलना चलना देर से सीखे, या हकलाना तोतलाना , रात में रोना दिन में सोना ,या इसका उल्‍टा ,रात में सोना दिन में रोना इसी प्रकार की और भी समस्‍याये होती है जिन्‍हे हम प्राय: रोग की श्रेणी में नही मानते चूंकि जैसा कि हम सभी जानते है कि होम्‍योपैथिक एक लक्षण विधान चिकित्‍सा पद्धति है ,एंव बच्‍चों के इस प्रकार की समस्‍या में होम्‍योपैथिक जादू की तरह से काम करती है । आप स्‍वय इन दवाओं के देकर इसके परिणाम देख सकते है । बच्‍चों का बोलना चलना देर से सीखना :- 1-बच्‍चों का देर से बोलना सीखना (नेट्रम म्‍यूर) :- यदि बच्‍चा देर से बोलना सीखे तो नेट्रम म्‍यूर दवा का प्रयोग किया जा सकता है । इस का रोगी सहानुभूति से क्रोधित हो जाता है पुष्‍टीकारक भोजन करने पर भी रोगी दुर्बल होते जाता है, शरीर ऊपर से नीचे की तरफ सूखता है । इसके रोगी को नमक के प्रति विशेष चाह होती है । इस दवा का असर गहरा परन्‍तु दर से होता है, इस दवा को 6 या 30 पोटेंशी में दिन में तीन बार देना चाहिये । 2-बच्‍चा देर से चलना सीखे (कैल्‍केरिया कार्ब) :- यदि बच्‍चा देर से चलना सीखे तो कैल्‍केरिया कार्ब दवा देना चाहिये वैसे तो कैल्‍केरिया कार्ब का मेरूदण्‍ड, टॉगे पतली और टेडी होने के साथ शरीर स्‍थूल मोटा ,हडिडीया कमजोर ,चलने फिरने में उसे तकलीफ होती है बच्‍चा दौड धूप नही कर सकता ,हर समय थका थका सा रहता है जहॉ बैठाल दो मिट्टी के माधव की तरह बैठा रहता है , शरीर ठंडा परन्‍तु सोते समय पसीना आना जिससे तकिया भींग जाता है यह कैल्‍केरिया का विलक्षण लक्षण है ठंडे कमरे में भी पसीना आता है जबकि ठंडे कमरे में रोकी को पसीना नही आना चाहिये रोगी के पैर वर्फ की तरह ठंडे होते है एंव शरीर से खटटी बू आती है परन्‍तु बच्‍चों का देर से चलना सीखने पर इसका प्रयोग करना चाहिये । प्रारम्‍भ में इस दवा को 12 या 30 पोटेंशी में कुछ दिनो तक देना उचित है । इसकी उच्‍च शक्ति का प्रयोग भी आवश्‍यकतानुसार किया जा सकता है । 3-बच्‍चा बोलना एंव चलना दोना देर से सीखे (एकारिकस) :- बच्‍चा यदि चलना एंव बोलना दोनों देर से सीखता हो तो उसे एकारिकस दबा देना चाहिये । इस औषधि के मुख्‍य लक्षण रोगी के अंगों का फडकना,मॉसपेशियों का थरथराना या कॉपना,शरीर में चींटी सी चलने की अनुभूति होना है । रात में रोना दिन में सोना 1-बच्‍चों का रात में रोना दिन में सोना (जेलपा) :- यदि बच्‍चा रात में रोता हो और दिन में सो जाता हो व शान्‍त खेलता रहता हो तो ऐसे बच्‍चों को जेलपा देना चाहिये , इसका बच्‍चा दिन भर तो अच्‍छी तरह से खेलता रहता है परन्‍तु रात्री में चिल्‍लाता है या रोता है डॉ सत्‍यवृत जी ने लिखा है कि यह बच्‍चों में पेट की गडबडी के कारण ऐसा होता है ,बच्‍चो को पेट र्दद और दस्‍त की भी शिकायत हो सकती है । इस परेशानी में 3, 6,12 पोटेंशी दवा में दिन में तीन बार देना चाहिये । 2 बच्‍चे का रात भर रोना दिन भर खेलना (सोरिनम) :-इस मामले में सोरिनम लाईको से उल्‍टा है । सोरिनम का बच्‍चा दिन भर खेलता है, परन्‍तु रात में रोता है । औषधि के निर्देशित लक्षण है इसके शरीर मल मूत्र ,पस तथा पसीने या शरीर से निकलने वाले स्‍त्रावों से बुरी गंध, सडे मॉस या अण्‍डे जैसी बदबू आती है । रोगी की त्‍वचा गंदी मैली होती है उसे कितना भी नहलाओं धुलाओं परन्‍तु वह साफ नही दिखती , रोगी नहाने से घबराता है , त्‍वचा खुरदरी, जगह जगह फटी हुई , त्‍वचा में दरारें जिसमें से रक्‍त आसानी से निकलता है ,खोपडी चहरे पर एग्‍जीमा ,बिस्‍तर में रोगी को खुजली, गर्म मौसम में भी रोगी को ठंड महसूस होती है, उसी ठंडी हवा सहन नही होती । इस दवा की रोग स्थिति के अनुसार 200 या 1-एम पोटेंसी की दवा होम्‍यो सिद्धान्‍त के अनुसार देना चाहिये । 30 पोटेंसी की दवाओं से भी उचित परिणाम प्राप्‍त किये जा सकते है । 3-बच्‍चा रात भर रोता है और दिन में ठीक रहता है (रियूम) :- यदि बच्‍चा रात भर रोता हो एंव दिन में ठीक रहता हो तो ऐसे बच्‍चों को रियूम देना चाहिये (डॉ सत्‍यवृत) । इसके बच्‍च्‍ो के शरीर से खट्टी बदबू तथा खट्टापन होता बच्‍चे के शरीर व हर अंग से पसीना आता है उसमें खट्टी बदबू होती है । इसके बच्‍चे को संतुष्‍ट करना कठिन होता है यह तेज मिजाज का एंव अधिर होता है । 4- बच्‍चा दिन में खेलता है लेकिन रात्री में रोता चिल्‍लाता है (साईप्रिपेडियम ) :- बच्‍चा दिन में तो अच्‍छी तरह से हॅसता खेलता रहता है, लेकिन रात होते ही रोने चिल्‍लाने लगता है, बच्‍चा रात्री में उठ कर एकाएक खेलने लग जाता है , हॅसने लगता है बच्‍चों में नींद की कमी पाई जाती है , यह दवा नीद के लिये भी उपयोगी है । इसके मूल अर्क को दस दस बूद दिन में तीन बार कुछ दिनों तक देना चाहिये परन्‍तु 3,6,12 तथा 30 पोटेंसी में परिणाम बहुत अच्‍छे मिलते है इस दवा को दिन में तीन बार दिया जा सकता है । बच्‍चा दिन में रोता है एंव रात्रि में सोता 1-बच्‍चा दिन में रोता है एंव रात्रि में सोता है (लाईकोपोडियम):- यदि बच्‍चा दिन में रोता रहता है एंव रात्रि में सोता रहता हो तो ऐसे बच्‍चों को लाईकोपोडियम दबा देना चाहिये । इसका बच्‍चा इतना स्‍नायु प्रधान होता है कि वह जरा सी खुशी पर भावुक हो जाता है उसकी ऑखों से ऑसू आ जाते है ,इसको ठंड बहुत लगती है ,सोते हुऐ बिस्‍तर में पेशाब कर देना ,इसके बच्‍चे की शारीरिक संरचना दुबला पतला,पीला चहरा,पिचके हुऐ गाल , अपनी उम्र से अधिक दिखना , बच्‍चे का सिर बडा और ठिंगना ,शरीर ऊपर से नीचे की तरफ क्षीण्‍ होता हुआ । 2-बच्‍चों का चौक कर उठना (बोरेक्‍स) :- यदि बच्‍चा चौक कर उठता हो तो उसे बोरेक्‍स देना चाहिये । बोरेक्‍स का बच्‍चा बहुत ही स्‍नायविक होता है, जरा से में चौक उठता है , यदि मॉ बच्‍चे को गोद से उतार कर पलंग पर लिटाती है तो वह चौक जाता है । इस दवा को 3, 6,12 तथा 30 पोटेंसी में देने से अच्‍छे परिणाम प्राप्‍त किये जा सकते है । 3-क्षूठ मूठ के रोने का उपक्रम (स्‍टेफिग्रेसिया):- यदि बच्‍चा क्षूठ मूठ के रोने का उपक्रम करे परन्‍तु ऑसू न आये तो ऐसी स्थितियों में उसे स्‍टेफिग्रेसिया 30 या 200 शक्ति में देने से उसकी यह आदत ठीक हो जाती है । इस दवा के निर्देशित लक्षणों में अपमान से क्रोध का घूंट पीने से जो भी रोग उत्‍पन्‍न होते हो, यह दवा बच्‍चों के मन पर भी प्रभाव करती है, बच्‍चों के क्रोध में कैमोमिला तथा स्‍टेफिग्रेसिया का प्रयोग किया जाता है ,बच्‍चों के दॉत काले पड जाते है उन पर काली रेखायें दिखती है । इस दवा को 3, 6,12 तथा 30 पोटेंसी में देने से अच्‍छे परिणाम प्राप्‍त किये जा सकते है । रोग स्थिति के अनुसार इसकी उच्‍च शक्ति का प्रयोग भी किया जा सकता है हकलाना या तोतलाना 1-हकलाना एंव तोतलाना (स्‍ट्रामोनियम-धतूरा):- यह दवा धतुरे से बनाई जाती है धतूरा खाने पर रोगी को शब्‍द उच्‍चारण करने में देर तक प्रयास करना पडता है, यह स्थिति हकलाने एंव तोतलाने जैसी होती है इसी लिये लिये हकलाने एंव तोतलाने की स्थिति में इस दवा का प्रयोग करना चाहिये । निर्देशानुसार 30 शक्ति में दिन में तीन बार प्रयोग करना चाहिये परन्‍तु अनुभवों को ज्ञात हुआ है कि इसकी 200 शक्ति की दवा सप्‍ताह में एक बार या फिर आवश्‍यकतानुसार कुछ अन्‍तरालो से देने पर भी अच्‍छे परिणाम मिलते है कुछ गृन्‍थकारो ने 1-एम शक्ति की अनुशंसा की है । हमने भी कई ऐसे बच्‍चे जो हकलाते व तोतलाते थे उन्‍हे इसकी 200 शक्ति की दवा तीन तीन दिन के अन्‍तर से दिया एंव हमे इसके बहुत ही अच्‍छे आशानुरूप परिणाम देखने को मिले है । 2- हकलाना एंव तोतलाना (कैनाबिस इंडिका- भांग):- कैनाबिस इंडिका को हम भांग कहते है इसे व्‍यक्ति नशा करने के लिये उपयोग करते है इसके सेवन से भी व्‍यक्ति एक वाक्‍य को शुरू करते ही आगे का वाक्‍य भूल जाता है उसे वाक्‍यों को बोलने में या शब्‍दों को बोलने में दिमाक पर काफी जोर लगाना पडता है इस स्थिति में वह हकलाता है या कभी कभी तोतलाने लगता है । निर्देशित प्रबल मानसिक लक्षणों में वह मरे हुऐ आदमियों के सपने देखता है और हर वक्‍त डरा रहता है लगातार सिर हिलाता एंव बकवास करता रहता है । हमने हकलाने व तोतलाने के कई प्रकरणों में इस दवा को मात्र हकलाने व तोतलाने के लक्षणों पर प्रयोग किया एंव हमे आशानुरूप परिणाम मिले है । इस दवा को 30 एंव 200 शक्ति में प्रयोग किया जा सकता है । 3-कैनेबिस (सैटाइवा- गांजा):- इस दवा के लक्षण भी हकलाने व तोतलाने की समस्‍या पर हूबहू मिलते कैनाबिस इंडिका से मिलते है , इसका रोगी भी वाक्‍य को शुरू करते ही आगे के वाक्‍यों को भूल जाता है अत: हकलाने व तोतलाने पर उक्‍त दोनो दवाओं में से किसी भी एक दवा का प्रयोग किया जा सकता है इसके रोगी के विशिष्‍ट लक्षण है रोगी कपडे का स्‍पर्श सहन नही कर सकता । इस दवा को 30 एंव 200 शक्ति में प्रयोग किया जा सकता है । 4- तोतलाने की अवस्‍था में (कास्टिकम):- तोतलाने की अवस्‍था में जिसमें दाहिनी जीभ अधिक प्रभावित हो एंव गले की आवाज कर्कश रहती हो , या फिर तोतलाना पक्षाधात की वजह से हो तो इस दवा का प्रयोग करना चाहिये , इस दवा का प्रयोग रोगावस्‍था के अनुसार 200 या 1एम्‍ा शक्ति का प्रयोग निर्देशित अंतराल से करना चाहिये , कुछ चिकित्‍सक निम्‍न शक्ति की अनुशंसा करते है जैसे 6 या 30 पोटेंसी की मात्रा दिन में तीन बार एक या दो सप्‍ताह प्रयोग करने पर उचित परिणाम परिलक्ष्ति होने लगते है । 6-जीभ मोटी होने के कारण हकलाता हो (जैल्सियम) :- शरीर की समस्‍त मॉसपेशीयों में सून्‍नता जींभ की क्रिया में बाधा पड जाना उसका काम ठीक से न हो पाना अंग उसकी इक्‍च्‍छा से कार्य न करते हो, सम्‍पूर्ण शरीर की शिथिलता के कारण यदि जीभ हकलाती हो तो इस दवा का प्रयोग किया जा सकता है, कुछ चिकित्‍सकों का अभिमत है कि जींभ मोटी होने के कारण हकलाहट होने पर भी यह दवा उपयोगी है । जैल्सियम 30 शक्ति की दवा का प्रयोग नियमित कुछ दिनों तक करना चाहिये । आवश्‍यकतानुसार इसकी उच्‍च शक्ति का प्रयोग निर्देशित लक्षणों के अनुसार किया जा सकता है । 

 डॉ0 सत्‍यम सिंह चन्‍देल (बी0 एच0 एम0 एस0,एम0डी0
 धमार्थ चिकित्‍सालय हीरो शो रूम के बाजू से
नर्मदा बाई स्‍कूल के पास बण्‍डा रोड 
मकरोनिया सागर म0प्र0 मकरोनिय मो-9300071924-9630309033 

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