( होम्योपैथी के चमत्कार भाग -2 )
अध्याय-15
गले
के रोग
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क्र |
रोग लक्षण |
औषधियॉ |
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(अ) टांसिल गले के दॉये भाग में :- |
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1 |
टांसिल या गले में रोग का आक्रमण पहले दांयी ओर होता है फिर यह बायी ओर को
फैलता है |
लाईकोपोडियम |
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2 |
मूर्ख, शारीरिक विकास देर से, नाटा कुरूप व्यक्ति जिनका पेट मोटा तथा हाथ
पैर या दुबले पतले |
बैराईटा कार्ब |
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3 |
गले में मछली का कांटा चुभने
का अनुभव हो |
एपिस मेल |
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(ब) टांसिल गले के बांये भाग में :- |
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1 |
रोगी सोते सोते एकदम चौक जाता है प्रदाह बायी ओर रंग बैगनी नीला |
लैकेसिस |
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स) दोनो तरुफ के टांसिल में |
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1 |
पहले गले के भीतर प्रदाह होकर दोनों बगल के टांसिल फूलकर लाल रंग के होने पर
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फाईटोलक्का डिकैण्ड्रा |
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2 |
रोगी को राक्षसी भूंख रोगी दिन व दिन सूखता चला जाता है |
आयोडम |
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3 |
टांसिल में अधिक सूजन हो जिससे रोगी केवल निगल सकता हो |
बैराइटा कार्ब |
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4 |
पीब होने पर |
हीपर सल्फ या साइलैसिया |
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5 |
गलसुआ की प्रत्येक
अवस्थाओं में |
मार्कसॉल, पिलोकार्पस |
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(द) बार बार टांसिल होना |
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1 |
बार बार टांसिल होना
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नेट्रम म्यूर |
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2 |
शरीर में जलन एंव
टांसिल में जलन |
केपिसकम |
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3 |
कौआ बढ जाने या
टांसिल के फूलने और बढ |
बैराइटा म्यूरिटिका |
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4 |
टांसिक अपना स्थान
बदलता है |
लेक कैनाइनम |
अध्याय-15
गले के रोग
टांसिल रोग :- गले के नीचे वाले गाठों में
जब सूजन हो जाती है तब उसे हम टांसलाईटिस कहते है ,जिसके कारण बुखार हो जाता है उसमें र्दद होने लगता
है अत: इस अवस्था में उसे खटाई या खटटे एंव ठंडी वस्तुयें नही खानी चाहिये रोगी को
बार बार बुखार आना एंव कमजोरी होना ,भूख न लगना इत्यादि लक्षण देखे जाते है यदि समय रहते इसका इलाज न किया गया तो
रोग स्थाई रूप धारण कर लेता है । इस कारण रोगी को भोजन करने पानी पीने यहॉ तक की
सॉस लेने में परेशानी होती है ।
(अ)
टांसिल गले के दॉये भाग में :-
1-टांसिल
या गले में रोग का आक्रमण पहले दांयी ओर होता है फिर यह बायी ओर को फैलता है
(लाईकोपोडियम) :-
यह दवा पहाडी सेवार से बनती है इस दवा की विशेष क्रिया शरीर
के दायें भाग में होती है यह एक सोरा दोष नाशक दवा है । इसका असर दीर्ध एंव स्थाई
होता है ,इसमें टांसिल या गले में रोग का आक्रमण पहले दांयी ओर होता है फिर यह बायी ओर
को फैलता है अर्थात उदभेद पहले दांयी तरफ से बायी तरुफ को बढता है । इस अवस्था
में रोगी को गरम वस्तुये,गर्म पेय खाने की इच्छा होती है ,गर्मी से रोगी को शांती मिलती है ,ठंडी वस्तु या शीतल पेय
पदार्थो के सेवन से रोगी के रोग में वृद्धि होती है । रोग चाहे टांसिल हो या न्युमोनिया
या अन्य गले के रोग का आक्रमण यदि दांयी तरुफ से रोग प्रारम्भ होता है तो इस दवा
का उपयोग कदापि नही भूलना चाहिये ।
2-मूर्ख,
शारीरिक विकास देर से, नाटा कुरूप व्यक्ति जिनका पेट मोटा तथा हाथ पैर या दुबले पतले (बैराईटा कार्ब) :- यह एक शीत प्रधान औषधि है अर्थात होम्योपैथिक सद्धान्तानुसार जो
व्यक्ति ठंडी या सर्दी का अधिक अनुभव करते है उन्हे यह दवा अधिक उपयोग है, इस दवा की प्रकृति का व्यक्ति
की याददाश कमजोर होती है देखने में वह अन्य अंग दुबले पतले है जिन्हे ठंडी हवा
लगते ही सर्दी हो जाया करती है उन पर इस हवा का विशेष महत्व है रोगी के पैरो के
तलवो में हमेशा पसीना एंव हाथ पैर ठण्डे रहते है । इस दवा के रोगी में टांसिल का
आक्रमण दाहिनी ओर होता है । डॉ0घोष ने लिखा है कि इसमें रोग का आक्रमण बायी ओर अधिक होता है । इसके अतिरिक्त
टांसिल में दायी ओर सूजन पीव या गले में धॉव हो जाने पर भी इस दवा का उपयोग किया
जाता है इस दवा की उच्च शक्ति की एक मात्रा देकर फल की प्रतीक्षा करनी चाहिये ।
3-गले में मछली
का कांटा चुभने का अनुभव हो (एपिस मेल) :- इस दवा में भी रोगी के गले में दायी तरुफ दर्द , सूजन, एंव रंग भूरा होता है, रोगी को प्यास नही लगती गले में घुटन एंव तेज बुखार ,तालू मूल के ऊपर धॉव हो जाना
इसके अतिरिक्त गले में ऐसा अनुभव होना जैसे मछली का कांटा चुभ गया हो
(ब) टांसिल गले के बांये भाग में :-
1-रोगी
सोते सोते एकदम चौक जाता है प्रदाह बायी ओर रंग बैगनी नीला (लैकेसिस) :-
यह सर्फ विष से बनने वाली दवा है इसका वर्णन रोगी के रोग का
आक्रमण बाई तरुफ से प्रारम्भ होकर दायी तरुफ को बढता है ,टांसिल का आक्रमण पहले बांयी तरुफ से प्रारम्भ होता
है ठीक लाईकोपोडियम के विपरीत ,इसका रोगी गर्म प्रकृति का होता है इस लिये गर्म वस्तु से रोग स्थान पर सेक
सहन नही कर सकता ,नीद में रोग वृद्धि होती है । इसलिये रोगी गर्म पेय या पदार्थ पसन्द नही करता
,र्दद
वाले स्थान में नीला बैगनी रंग दिखलाई पडे तो इसका उपयोग कदापी नही भूलना चाहिये ,होम्योपैथिक में कोई भी दवा
को किसी विशेष रोग में नही चलाया जाता परन्तु यदि रोगी के लक्षण रोगानुकूल हो तो
चाहे जो भी रोग हो औषधि अपना चमत्कार अवश्य दिखलायेगी । लैकेसिस सर्फ विष से
बनने वाली एक विषाक्त औषधि है अत:इसका प्रयोग पूर्ण सावधानी से करना चाहिये इसका अदभूत लक्षण यह है कि रोगी
सोते सोते एकदम से चौक कर जाग जाता है दुसरा लक्षण रोगी के प्रदाह बायी ओर से परन्तु
जो समक्षने वाली बात है वह स्थान बैगनी नीला पड जाता है यदि इसी प्रकार से बैगनी
नीला रंग चर्म दोष या फुंसियॉ इत्यादि अगर पहले बायी ओर से प्रारम्भ हो तो इस
दवा का विशेष लक्षण समक्षना चाहिये । टांसिल के बाये प्रदाह के साथ गले का कोई भी
रोग यहॉ तक की जख्म इत्यादि ही क्यों न हो इसके लक्षणों पर यदि ध्यान रख औषधि
दी जाये तो निश्चित सफलता मिलेगी । वैसे इस दवा ने मुक्षे कभी निराश नही किया है ।
इस दवा का प्रयोग मूल अर्क एंव निम्न शक्ति में कदापी नही करना चाहिये एंव इसे
बार बार दोहराना उचित नही है यह शरीर में गहराई तक क्रिया करने वाली एक तीब्र
प्रभावकारी औषधि है इस दवा की उच्च शक्ति200 देकर प्रतिफल की प्रतीक्षा करना चाहिये ।
(स) दोनो तरुफ के टांसिल में :-
1-पहले
गले के भीतर प्रदाह होकर दोनों बगल के टांसिल फूलकर लाल रंग के होने पर (फाईटोलक्का
डिकैण्ड्रा) :-
यह दवा गुल्म की ताजा
जड से बनाई जाती है । रोग का आक्रमण पहले गले के भीतर प्रदाह होकर दोनों बगल के
टांसिल फूलकर लाल रंग के हो जाते है उसके बाद वहॉ सादे लेप या सफेद बिन्दू सरीख
दॉग पड जाते है ,गले के भीतर तेज र्दद होता है ,मुंह तथा गले के धॉव में फाइटोलक्का महौषधि है । गले के भीतर सूखापन मालुम
होता है ,कोई भी चीज निगलते समय ऐसा लगता है जैसे कि गले में कुछ अटक रहा है तरल वस्तु
या गरम जल निगला नही जा सकता ,रोगी को कमजोरी मालुम होती है । इस दवा का वाहय प्रयोग एंव 30 शक्ति की दवा उपयुक्त है
परन्तु आवश्यकतानुसार उच्च शक्तियों में भी प्रयोग किया जा सकता है ।
2-रोगी को राक्षसी भूंख रोगी दिन व दिन सूखता चला जाता
है (आयोडम) :- इस दवा को आयोडीन 1-भाग तथा 99-भाग अल्कोहल में मिला कर इसकी 2-एक्स शक्ति बनाई जाती है यह
दवा कर्णमूल ग्रन्थि ,स्तन ग्रन्थि, अण्डकोष ग्रन्थि की तरह की
ग्रन्थियों की सूजन में अत्याधिक फायदेमंद दवा है । रोगी को राक्षसी भूंख लगती है
,परन्तु
रोगी दिन व दिन सूखता चला जाता है ,गलगण्ड या धेधा रोग होना ,टांसिल की नये प्रदाह में आयोडम लाभकारी है किन्तु पुरानी अवस्था में नही डॉ0 ऐलने का कहना है कि गलगण्ड
या धेधा रोग के गाठों में इसका वाहय प्रयोग कदापी नही करना चाहिये ।
चिकित्सा विवरण :- 1-प्रारम्भिक अवस्था में जब
रोगी को बुखार हो साथ ही प्रदाह सूजन इत्यादि हो , धबराहट जैसी अवस्था हो तो प्राय: एकोनाइट 3 -एक्स ,या30 -शक्ति में देना चाहिये ,इसके साथ फेरमफॉस 6 -एक्स या 30
-शक्ति में देना चाहिये ।
3-टांसिल
में अधिक सूजन हो जिससे रोगी केवल निगल सकता हो (बैराइटा कार्ब) :- रोग की उग्र अवस्था में दी जा सकती है साथ ही जब
टांसिल में अधिक सूजन हो जिससे रोगी केवल निगल सकता हो तब इस दवा को दे ,बैराईटा कार्ब टांसिल रोग की
एक महत्वपूर्ण दवा है ।
4-पीब होने पर (हीपर सल्फ या साइलैसिया) :- यदि टांसिल में पीब होने लगे तब आप हीपर सल्फ या
साइलैसिया का प्रयोग कर सकते है परन्तु यह दवा देने हो सकता है कि पस बनने लगे या
फिर सूख भी सकता है अत: इस दवा को सम्हल कर देना उचित है ।
5- गलसुआ की प्रत्येक अवस्थाओं में (मार्कसॉल, पिलोकार्पस) : - मार्क
सॉल एंव पिलोकार्पस गलसुआ की प्रत्येक अवस्था में सर्वोधिक उपयोगी दवायें है ।
(द) बार बार टांसिल होना :-
1-बार
बार टांसिल होना (नेट्रम म्यूर) :- यह दवा एक बायोकेमिक दवा है इसका रसायनिक नाम सोडियम क्लोराइड है
जिसे हम सभी नमक के नाम से जानते है ।
रोगी को बार बार टांसिल
होना ,जिसके कारण बुखार गले में सूजन ,टांसिल का फूलना एंव पकना ,तकलीफ तीन चार दिन बराबर बनी रहती है । टांसिल के पक कर पीब निकल जाने पर रोगी
को आराम मिलता है , रोगी को नमकीन वस्तुओं की चाहत रहती है । इसे 6 या 12
एक्स या 30
शक्ति में या आवश्यकतानुसार उच्च शक्ति में प्रयोग किया
जा सकता है
2-शरीर
में जलन एंव टांसिल में जलन (केपिसकम) यह दवा लाल
मिर्च से तैयार की जाती है ,शरीर में जलन होना इसका लक्षण है ,यदि टांसिल बैगनी रंग का हो जाये एंव उसमें जलन
हो ,गले के भीतर ज्वाला के साथ सिकुडन रहे या संकोच हो
धॉव सरिका र्दद हो तब आप इस दवा का प्रयोग कर कर सकते ,गले का कौवा बढ जाने पर इस दवा के वाहय प्रयोग से
विशेष लाभ होता है ,दवा का मूलअर्क को पानी में या बेसलीन या ग्लीसरीन में मिला कर लगाया जा सकता
है । शराबीयों के गले के धॉव में यह दवा विशेष लाभकारी है ।
3- कौआ बढ जाने या टांसिल के फूलने और बढ (बैराइटा म्यूरिटिका)
:- कौआ बढ जाने या टांसिल के फूलने और बढ जाने पर
जिससे निगलने में तकलीफ होती हो ,सर्दि लग कर बीमारी उत्पन्न्ा हो ,जिन व्यक्तियों को बार बार तालु मुंह प्रदाह हुआ
करता हो पकता हो ,पीव हो जाया करती हो उनके लिये बैराइटा म्यूर ही लाभदायक दवा है । बहुत दिनों
के पुराने टांसिलाटिस में भी इसकी उच्च शक्ति सी एम या डी एम से रोग आरोग्य हो
जाता है ।
4- टांसिक अपना स्थान बदलता है (लेक कैनाइनम) :- यह दवा कुतिया के दुध से बनाई जाती है इसमें सम्पूर्ण
शरीर मे कभी एक तरुफ र्दद उठता है फिर अचानक र्दद का स्थान बदल जाता है ,इसी प्रकार टांसिल का एक दिन
र्दद दायी तरुफ तो दूसरे दिन बाई तरुफ इस प्रकार स्थान बदले तो यह दवा उपयोगी है
।
उपरोक्त सभी सभी दवाओं का प्रयोग
प्रारम्भ में 30 शक्ति में करना चाहिये रोग परस्थितियों के अनुसार चिकित्सा इन
दवाओं की उच्च्ा शक्ति का भी प्रयोग कर सकते है यह चिकित्सकों के अनुभव एंव
उनके औषधि निर्वाचन प्रक्रिया पर निर्भर करता है ।
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